जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हाल ही में कई मामलों में चिकित्सा महाविद्यालयों और चिकित्सा शिक्षा निदेशक (DME) को छात्रों के मूल दस्तावेज (original documents) वापस करने के आदेश दिए हैं। सबसे ताज़ा मामला मार्च 2026 का है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!दरअसल, न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की पीठ ने 2 मार्च 2026 तक एक आदिवासी डॉक्टर (डॉ. अजय मंडलोई) के मूल दस्तावेज लौटाने का कड़ा निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता ने महात्मा गांधी मेमोरियल (MGM) मेडिकल कॉलेज, इंदौर में पीजी (MS Gynaecology) कोर्स में प्रवेश लिया था, लेकिन रैगिंग और मानसिक प्रताड़ना के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी।
यह है मामला
कॉलेज और DME ने छात्र के दस्तावेज रोक लिए थे और 30 लाख रुपए के ‘सीट लीविंग बॉन्ड’ (seat-leaving bond) की मांग कर रहे थे। मामले में न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि दस्तावेजों के कब्जे में होने के बावजूद “तकनीकी आधार” पर किसी छात्र को परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि छात्र को 5 मार्च 2026 को मेडिकल ऑफिसर पद के लिए साक्षात्कार (interview) में शामिल होना था, जिसके लिए मूल दस्तावेज अनिवार्य थे।
अन्य हालिया संबंधित आदेश
जनवरी 2026: उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इन-सर्विस सरकारी डॉक्टरों को पीजी कोर्स पूरा करने के बाद ग्रामीण सेवा बॉन्ड पूरा करने की आवश्यकता नहीं है और उनके प्रमाण पत्र वापस किए जाने चाहिए।
मई 2025: जबलपुर की खंडपीठ ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज को एक छात्रा के दस्तावेज बिना 30 लाख रुपए का जुर्माना लिए लौटाने का आदेश दिया था। छात्रा ने अपने पिता की मृत्यु के बाद परिवार की देखभाल के लिए कोर्स छोड़ा था।
अप्रैल 2025: कोर्ट ने बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज, सागर को मणिपुर के एक छात्र के दस्तावेज और NOC लौटाने का निर्देश दिया, जो अपने गृह राज्य में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण कोर्स छोड़ना चाहता था।
ये सभी फैसले राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के उस सुझाव के अनुरूप हैं, जिसमें राज्यों से ‘सीट लीविंग बॉन्ड’ नीति की समीक्षा करने को कहा गया है ताकि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव न पड़े।
पहले भी सामने आते रहे हैं मामले
भारत में शैक्षणिक संस्थानों द्वारा छात्रों के मूल दस्तावेज (Original Documents) जमा रखने या न लौटाने के मामलों में विभिन्न वर्षों में महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव और दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
वर्षवार मुख्य घटनाक्रम और दिशा-निर्देश
2016 (यूजीसी का कड़ा रुख): विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने स्पष्ट अधिसूचना जारी की कि कोई भी उच्च शिक्षण संस्थान प्रवेश के समय छात्रों के मूल प्रमाण पत्र जमा नहीं कर सकता। संस्थान केवल सत्यापन के बाद उन्हें तुरंत वापस करने के लिए बाध्य हैं।
2019 (मद्रास उच्च न्यायालय का आदेश): कोर्ट ने अन्ना विश्वविद्यालय के तहत एक निजी कॉलेज को आदेश दिया कि वह बीच में कोर्स छोड़ने वाले छात्र के सभी मूल दस्तावेज और प्रवेश शुल्क वापस करे।
2020 (मानवाधिकार उल्लंघन श्रेणी): राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मूल दस्तावेजों को न लौटाने को मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में शामिल किया। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भी कहा कि कॉलेज दस्तावेजों को रखकर छात्रों को ‘ब्लैकमेल’ नहीं कर सकते।
2024 (निजी कॉलेजों पर सख्ती): रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर सहित कई शहरों में निजी कॉलेजों को चेतावनी दी गई कि वे मूल दस्तावेज जमा नहीं रख सकते। इसी वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों के संदर्भ में भी स्पष्ट किया कि वे छात्रों के दस्तावेज नहीं रोक सकते।
2025 (न्यायालय का सख्त रुख): विभिन्न उच्च न्यायालयों ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक प्रमाण पत्रों को फीस वसूली के लिए ‘बंधक’ (Collateral) के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता।
छात्र क्या कदम उठा सकते हैं?
यदि कॉलेज दस्तावेज नहीं लौटा रहा है, तो छात्र निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं।
औपचारिक आवेदन: लिखित में आवेदन दें और पावती (Acknowledgement) लें।
यूजीसी/एआईसीटीई शिकायत: संबंधित नियामक संस्था के ऑनलाइन पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।
पुलिस या कानूनी नोटिस: कानूनी सलाह लेकर संस्थान को लीगल नोटिस भेजें या पुलिस में शिकायत दर्ज कराएं।
