भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार टॉसपेरेंसी को लेकर लाख दावे करे, लेकिन जमीन हकीकत इससे अलग है। मध्य प्रदेश में सात जांच आयोगों की रिपोर्ट पिछले कई सालों से राज्य सरकार के पास लंबित पड़ी हैं। पिछले कुछ सालों में विधानसभा में केवल एक जांच रिपोर्ट पेश की गई थी। जब किसी जांच आयोग की रिपोर्ट सरकार के पास पहुंचती है, तो अधिकारी उसे संबंधित विभागों को भेज देते हैं। इसके बाद रिपोर्ट को सदन के सामने रखा जाता है ताकि वह सार्वजनिक जानकारी में आ सके। हालांकि, सरकार ने विधानसभा में कई जांच रिपोर्ट पेश नहीं की हैं, जिससे वे जनता की नजरों से दूर रही हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!इन आयोगों की जांच रिपोर्ट पेंडिंग
2010 में, सरकार ने यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से जहरीली गैस के रिसाव की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया था। जस्टिस एस.एल. कोचर ने इस आयोग की अध्यक्षता की थी, जिसने 2015 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी; यह रिपोर्ट अभी भी सरकार के पास लंबित है।
भिंड जिले में हुई गोलीबारी की जांच के लिए 2012 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस सी.पी. कुलश्रेष्ठ की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था। आयोग ने 2017 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे 2018 में गृह विभाग को भेज दिया गया था।
सामाजिक सुरक्षा पेंशन से जुड़े एक मामले को देखने के लिए 2008 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस एन.के. जैन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था। इसने 2012 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जो अभी भी सामाजिक न्याय विभाग के पास लंबित है।
ग्वालियर में एक पुलिस मुठभेड़ में हुई मौतों की जांच के लिए, 2015 में गठित एक आयोग ने 2017 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। गृह विभाग अभी भी इस पर काम कर रहा है।
पेटलावद विस्फोट मामले की जांच के लिए 2015 में जस्टिस आर्येंद्र कुमार सक्सेना की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था। इसने अपने गठन के तीन महीने के भीतर ही अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन गृह विभाग अभी भी इस पर काम कर रहा है।
इसी तरह, किसानों पर हुई गोलीबारी की जांच के लिए सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस जे.के. जैन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था। 2018 में गृह विभाग को भेजी गई यह रिपोर्ट अभी भी लंबित है। 2022 में लाटेरी गोलीबारी की घटना की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस VPS चौहान की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था। 2015 में सौंपी गई यह रिपोर्ट वन विभाग के पास लंबित है।
मप्र में अब तक बने जांच आयोग
मध्य प्रदेश में विभिन्न घटनाओं और विवादों की जांच के लिए समय-समय पर कई जांच आयोग (Commissions of Inquiry) गठित किए गए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख आयोग और वर्तमान में सक्रिय जांच समितियां।
हालिया और सक्रिय जांच आयोग
इंदौर भागीरथपुरा दूषित जल जांच आयोग (2026): मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी से हुई मौतों और बीमारी की जांच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है। इसकी अध्यक्षता उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश प्रशासनिक पुनर्गठन आयोग (2025-26): यह आयोग प्रदेश की प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन और सुशासन के लिए सुझाव देने हेतु गठित किया गया है।
महत्वपूर्ण राज्य आयोग (संवैधानिक एवं वैधानिक)
ये आयोग अपनी विशिष्ट कार्यप्रणालियों के तहत निरंतर जांच और निगरानी का कार्य करते हैं।
मध्य प्रदेश राज्य वित्त आयोग: वर्तमान में 6वें वित्त आयोग का गठन किया गया है, जिसकी कमान जयभान सिंह पवैया को सौंपी गई है।
मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग: RTI अधिनियम 2005 के तहत गठित यह आयोग सूचना न देने संबंधी शिकायतों की जांच करता है।
मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग: मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों की जांच के लिए जिम्मेदार है।
मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग: इसे राज्य में पिछड़ा वर्ग के हितों और आरक्षण से संबंधित मामलों की जांच का अधिकार है।
ऐतिहासिक और चर्चित जांच आयोग
अतीत में कई बड़ी घटनाओं की जांच के लिए आयोग बने, हालांकि कई की रिपोर्टों पर कार्रवाई अभी भी लंबित है।
रामजी आयोग: यह ओबीसी आरक्षण से संबंधित एक पुराना आयोग है जिसकी रिपोर्ट वर्तमान में भी चर्चा का विषय रहती है।
परिसीमन आयोग: मध्य प्रदेश में अब तक चार बार (1952, 1963, 1973 और 2002) परिसीमन अभ्यास किया जा चुका है।
मुख्य बिंदु: राज्य में पिछले 17 वर्षों में लगभग आठ बड़ी घटनाओं के लिए जांच आयोग गठित किए गए, लेकिन रिपोर्टों पर त्वरित कार्रवाई की कमी एक प्रमुख मुद्दा रही है।
