भोपाल (मध्य प्रदेश)। BJP प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने एक ऐसी प्रक्रिया शुरू की थी, जिसके तहत सरकार के मंत्री और संगठन के नेता विभिन्न मुद्दों पर चर्चा कर सकें। इस तरह की बैठक को ‘टोली बैठक’ कहा जाता था।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!इसमें मुख्यमंत्री मोहन यादव और दो उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल और जगदीश देवड़ा के अलावा मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह और तत्कालीन संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा शामिल थे। दूसरी ‘टोली बैठक’ में क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जम्वाल और पार्टी के प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह ने हिस्सा लिया था।
लेकिन दो बैठकों के बाद ‘टोली बैठक’ नहीं हुई। हालांकि जब यह प्रक्रिया शुरू की गई थी, तब कहा गया था कि ऐसी ‘टोली बैठकें’ हर दो महीने में आयोजित की जाएंगी। इसका उद्देश्य सरकार और संगठन के बीच अनौपचारिक चर्चाएं करना था, ताकि भविष्य की योजनाओं पर काम किया जा सके। एक और उद्देश्य चर्चाएं करना था, ताकि प्रतिभागी अपने विचार प्रस्तुत कर सकें।
पहली बैठक 20 सितंबर को और दूसरी बैठक पिछले साल 13 नवंबर को हुई थी। सूत्रों के अनुसार, इन बैठकों में कुछ ऐसे मुद्दे उठे, जिनसे सरकार और संगठन दोनों ही असहज महसूस करने लगे।
कोर ग्रुप बनाने की कवायद जारी
BJP में एक कोर ग्रुप बनाने की कवायद चल रही है। कार्यसमिति की घोषणा के बाद पार्टी चर्चाएं कर रही है, ताकि कोर ग्रुप, अनुशासन समिति और चुनाव समिति के गठन की घोषणा की जा सके। पिछला कोर ग्रुप 2022 में बनाया गया था।
2023 में नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ढाई साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन कोर ग्रुप का गठन अभी तक नहीं हो पाया है। उस समय के प्रदेश अध्यक्ष VD शर्मा के अलावा, तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा और BJP के 18 अन्य नेता भी इसमें शामिल थे।
कोर ग्रुप में मुख्यमंत्री, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष, केंद्रीय और राज्य मंत्री, पार्टी के राष्ट्रीय और राज्य पदाधिकारी और कुछ विधायक शामिल होते हैं, क्योंकि BJP में वरिष्ठ नेताओं की संख्या बहुत ज़्यादा है, इसलिए पार्टी को कोर ग्रुप बनाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
टोली बैठक
‘टोली बैठक’ आमतौर पर पार्टी के कोर नेताओं और संगठन के प्रमुख पदाधिकारियों के बीच होती है। इसमें चुनाव रणनीति, संगठन विस्तार, और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होती है। लंबे समय तक बैठक न होना पार्टी के अंदर रणनीतिक ठहराव या व्यस्तता का संकेत माना जा रहा है।
संभावित कारण
रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके पीछे कुछ वजहें मानी जा रही हैं।
लगातार चुनावी व्यस्तता (राज्य चुनाव, लोकसभा तैयारी)
शीर्ष नेतृत्व का सरकारी कामों में व्यस्त होना
संगठन में आंतरिक पुनर्गठन/रणनीति बदलाव
राजनीतिक मायने
विपक्ष इसे संगठन में ढीलापन बता रहा है। वहीं पार्टी के अंदर इसे व्यस्त चुनावी कैलेंडर का परिणाम माना जा रहा है। आने वाले चुनावों को देखते हुए जल्द ही ऐसी बैठकों के फिर शुरू होने की संभावना जताई जा रही है।
