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एआई निगरानी से पकड़ी खरीदी में गड़बड़ी : एसीएस दुबे

aaptak.co.in1@gmail.com October 25, 2026
vallabh bhavan bhopal ias transfer

—नगरीय निकायों की 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी का विश्लेषण
—392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में

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भोपाल। मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी खरीदी की दरों में भारी अंतर को लेकर उठे विवाद के बीच नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) संजय दुबे ने सफाई दी है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो अधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा था। इसका उद्देश्य यह बताना था कि विभाग कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डिजिटल डेटा और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से खरीदी तथा भुगतान की निगरानी कैसे कर रहा है।

दुबे के अनुसार, सरकार का उद्देश्य सरकारी धन के दुरुपयोग को रोकना और खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। विभाग ने जेम (GeM) पोर्टल पर उपलब्ध खरीद संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण कर विभिन्न नगरीय निकायों में समान या मिलती-जुलती वस्तुओं की दरों में अंतर की पहचान की है।

वायरल वीडियो पर क्यों मचा विवाद?

कुछ दिन पहले सामने आए वीडियो में संजय दुबे नगरीय निकायों के अधिकारियों को खरीदी में अनियमितताओं को लेकर चेतावनी देते नजर आए थे। वीडियो में उन्होंने कहा था कि विभाग को पता है कि कौन-सा निकाय क्या सामान खरीद रहा है, कितनी मात्रा में खरीद रहा है और किस दर पर भुगतान कर रहा है।

वीडियो में कचरा वाहनों, एलईडी लाइटों और अन्य सामग्रियों की खरीद में सामने आए दरों के अंतर का भी उल्लेख था। इसके बाद मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया और विपक्ष ने सरकारी खरीद व्यवस्था पर सवाल उठाए।

छह महीने में प्रशिक्षण, निगरानी के तरीके बताए

25 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, दुबे ने स्पष्ट किया कि विभाग लगभग हर छह महीने में नगरीय निकायों के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करता है। वायरल वीडियो 16 अप्रैल 2026 को हुए ऐसे ही एक कार्यक्रम का बताया गया है।

इस प्रशिक्षण में अधिकारियों को समझाया गया कि विभाग किस तरह डिजिटल रिकॉर्ड और डेटा विश्लेषण की मदद से खरीद तथा भुगतान पर निगरानी रखता है। इसका उद्देश्य अधिकारियों को नियमों के पालन के प्रति सचेत करना और संभावित अनियमितताओं को समय रहते पकड़ना था।

एआई से कैसे पकड़ी जा रही है गड़बड़ी?

एसीएस के मुताबिक, नगरीय निकायों की अपनी आय और अलग-अलग बजट होते हैं। इसलिए केवल राज्य सरकार से मिलने वाले अनुदान के आधार पर पूरे खर्च की निगरानी करना पर्याप्त नहीं था। इसी कारण खरीद और भुगतान व्यवस्था को डिजिटल निगरानी से जोड़ा गया है।

विभागीय व्यवस्था में:

खरीद के लिए जेम पोर्टल का इस्तेमाल किया जाता है।

बिलिंग और भुगतान की प्रक्रिया ई-नगरपालिका पोर्टल से जोड़ी गई है।

एआई और डेटा एनालिटिक्स से विभिन्न निकायों में खरीदी गई वस्तुओं की कीमतों की तुलना की जाती है।

समान या मिलती-जुलती सामग्री की दरों में असामान्य अंतर और एक ही आपूर्तिकर्ता के अलग-अलग निकायों में किए गए सौदों की पहचान की जाती है।

दुबे ने बताया कि विभाग में प्रतिदिन लगभग 1,000 से 1,500 खरीद आदेश जारी होते हैं। इनमें छोटी स्टेशनरी सामग्री से लेकर बड़े निर्माण और बुनियादी ढांचा विकास कार्य शामिल हैं। इतने बड़े डेटा का विश्लेषण करने के लिए तकनीकी निगरानी उपयोगी साबित हो रही है।

1,134 करोड़ की खरीदी, 250 करोड़ बचने की संभावना

विभागीय समीक्षा के अनुसार, प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने पिछले तीन वर्षों में जेम पोर्टल के माध्यम से करीब 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की। उपलब्ध तुलनात्मक विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि यदि कई वस्तुएं औसत तुलनीय दरों पर खरीदी जातीं, तो लगभग 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत हो सकती थी।

यह आंकड़ा संभावित बचत का अनुमान है, न कि जांच में अंतिम रूप से प्रमाणित सरकारी नुकसान। वास्तविक अंतर का आकलन करते समय वस्तु की गुणवत्ता, मॉडल, क्षमता, अतिरिक्त उपकरण, कर और आपूर्ति शर्तों का मिलान करना आवश्यक है।

रिपोर्टों में कचरा वाहनों और एलईडी लाइटों की कीमतों में बड़े अंतर के उदाहरण सामने आए। इन मामलों में विभागीय जांच से ही यह स्पष्ट होगा कि अंतर के पीछे तकनीकी जरूरत, अलग विनिर्देश, खरीद प्रक्रिया की कमी या कोई अन्य अनियमितता जिम्मेदार थी।

392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में

संजय दुबे के बयान पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार, विभिन्न खरीद संबंधी अनियमितताओं में अब तक करीब 392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में आए हैं। इनमें लगभग 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) शामिल बताए गए हैं।

विभागीय आंकड़ों के अनुसार:

सात अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया।

लगभग 146 अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी।

गलत भुगतान से जुड़े मामलों में करीब तीन से चार करोड़ रुपये की वसूली किए जाने की जानकारी दी गई।

80 से अधिक ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की गई।

ये आंकड़े विभागीय कार्रवाई के अलग-अलग चरणों से संबंधित हैं। इन्हें एक ही श्रेणी में जोड़ना या सभी संबंधित व्यक्तियों को दोषी मानना उचित नहीं होगा। अंतिम जिम्मेदारी प्रत्येक मामले की जांच और आदेशों के आधार पर तय होगी।

मंत्री प्रतिमा बागरी ने दिए उच्चस्तरीय जांच के निर्देश

वायरल वीडियो और खरीद में कथित अनियमितताओं को लेकर राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी ने 22 अक्टूबर को उच्चस्तरीय जांच कराने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि विभाग में खरीद और निर्माण कार्यों की निगरानी की जाती है और नियमों के उल्लंघन की शिकायत मिलने पर जांच की जाती है। मंत्री ने यह भी कहा कि जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि अलग-अलग वस्तुओं की कीमतों में इतना अंतर क्यों आया और खरीद व्यवस्था में मौजूद संभावित कमियों को कैसे दूर किया जा सकता है।

कांग्रेस ने उठाए सवाल

मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस प्रकरण को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने सरकारी खरीद में कथित अनियमितताओं को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग की और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए। विपक्ष का कहना है कि यदि सरकारी खरीद में लंबे समय से अनियमितताएं हो रही थीं, तो उनके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।

आगे क्या?

अब इस मामले में उच्चस्तरीय जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे। जांच में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन खरीद आदेशों में कीमतों का अंतर वास्तविक जरूरतों के कारण था और किन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ। साथ ही, वसूली, अनुशासनात्मक कार्रवाई और आपूर्तिकर्ताओं पर की गई कार्रवाई का निकायवार विवरण सार्वजनिक होना भी जरूरी है।

एआई के जरिए अनियमितताओं की पहचान करना निगरानी का महत्वपूर्ण साधन हो सकता है, लेकिन किसी खरीद को भ्रष्टाचार का मामला मानने के लिए दस्तावेजों, भुगतान, आपूर्ति और संबंधित अधिकारियों की भूमिका का सत्यापन आवश्यक है।

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