नई दिल्ली। हाल ही में प्रकाशित शोधों के अनुसार, भारत में मधुमेह (डायबिटीज) का आर्थिक बोझ 2020 से 2050 के बीच 11.4 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 950 लाख करोड़) तक पहुंचने का अनुमान है। यह राशि भारत की वर्तमान वार्षिक जीडीपी (GDP) से लगभग तीन गुना अधिक है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!यह गंभीर अदृश्य आर्थिक खतरे के पीछे कई कारण हैं। इनमें अनौपचारिक देखभाल प्रमुख है। इसमें कुल बोझ का लगभग 90 फीसदी हिस्सा परिवार के सदस्यों द्वारा की जाने वाली अवैतनिक देखभाल से आता है। जब कोई परिजन बीमार होता है, तो परिवार के अन्य सदस्यों को अक्सर अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है या काम के घंटे कम करने पड़ते हैं, जिससे देश की श्रम उत्पादकता में भारी गिरावट आती है।
युवा आबादी पर प्रभाव
भारत में मधुमेह पश्चिमी देशों की तुलना में कम उम्र में और कम वजन पर ही हो रहा है। इसका मतलब है कि लोग अपने सबसे उत्पादक वर्षों (20-60 वर्ष) के दौरान दशकों तक इस बीमारी और इसकी जटिलताओं से जूझते हैं।
उत्पादकता का नुकसान
इलाज के खर्च के अलावा, बीमारी के कारण होने वाली समय से पहले मृत्यु, विकलांगता और काम से अनुपस्थिति अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित करती है।
इलाज का खर्च और गरीबी
भारत में मधुमेह के इलाज का 54 फीसदी से अधिक हिस्सा दवाओं पर खर्च होता है। लगभग 20 फीसदी मरीज इस बीमारी के खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। मौजूदा दौर में भारत दुनिया में मधुमेह के दूसरे सबसे बड़े बोझ का सामना कर रहा है, जहां दुनिया के हर चार में से एक मधुमेह रोगी भारत में रहता है।

रिपोर्ट में
भारत में दुनिया के एक चौथाई से अधिक मधुमेह रोगी रहते हैं।
भारत में विश्व स्तर पर सबसे अधिक मधुमेह रोगी हैं।
100 मिलियन से अधिक लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं
मधुमेह के कुल आर्थिक बोझ का लगभग 90 फीसदी अप्रत्यक्ष लागतों से आता है
भारत में मधुमेह से पीड़ित लगभग 62 फीसदी लोगों को कोई उपचार नहीं मिल रहा
उच्च आय वाले देश मधुमेह की लागत का एक बड़ा हिस्सा उपचार पर खर्च करते हैं
भारत में लागत का 14 फीसदी उपचार की ओर जाता है
