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महिला आरक्षण बिल पर घमासान, बैकफुट पर सरकार

aaptak.co.in1@gmail.com April 18, 2026
woman researvation bill politics1

नई दिल्ली। भारत में महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) एक ऐतिहासिक कानून है जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है। हालिया घटनाक्रम के अनुसार, 17 अप्रैल 2026 को इस कानून में संशोधन के लिए लाया गया 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया है।

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मुख्य विशेषताएं (नारी शक्ति वंदन अधिनियम)

33% आरक्षण: लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

SC/ST कोटा: आरक्षित सीटों के भीतर ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए भी आरक्षण शामिल है।

अवधि: यह आरक्षण शुरू में 15 वर्षों के लिए लागू होगा, जिसे बाद में संसद द्वारा बढ़ाया जा सकता है।

रोटेशन: प्रत्येक परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया के बाद आरक्षित सीटों को बदला (Rotate) जाएगा।

संसद में हाल ही में हुए घटनाक्रम

विधेयक का गिरना: सरकार द्वारा पेश किया गया 131वां संशोधन बिल पारित नहीं हो सका। इसके पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े।

विवाद का कारण: विपक्ष ने इस बिल में परिसीमन (Delimitation) और जातिगत जनगणना के मुद्दों को लेकर कड़ा विरोध जताया।

लागू होने की तिथि: मूल योजना के अनुसार इसे 2029 के आम चुनावों से लागू किया जाना था, लेकिन वर्तमान संशोधन के विफल होने से इस पर अनिश्चितता बनी हुई है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया: बीजेपी ने इसके लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि विपक्ष ने इसे महिलाओं के साथ “साजिश” करार दिया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1996: पहली बार एच.डी. देवेगौड़ा सरकार ने इसे पेश किया था।
2010: मनमोहन सिंह सरकार के दौरान इसे राज्यसभा में पारित किया गया था, लेकिन लोकसभा में यह अटक गया।
2023: मोदी सरकार ने इसे 128वें संविधान संशोधन विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के रूप में पेश किया, जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 106वां संविधान संशोधन अधिनियम बनाया गया।

भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब 131वां संविधान संशोधन विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम का विस्तार) लोकसभा में पारित नहीं हो सका।
यह विधेयक 2023 में पारित मूल महिला आरक्षण कानून को तेजी से लागू करने और संसद की सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए लाया गया था।

कानूनी और संवैधानिक पहलू

संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।

आवश्यकता: सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) समर्थन।

मतदान परिणाम: मतदान के समय 528 सदस्य उपस्थित थे, जिसके लिए 352 वोटों की जरूरत थी। बिल को 298 पक्ष और 230 विपक्ष में वोट मिले, जिससे यह गिर गया।

सीटों में वृद्धि: बिल में लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 815 (राज्यों से) + 35 (केंद्र शासित प्रदेशों से) यानी कुल 850 करने का प्रस्ताव था।

परिसीमन का आधार: सरकार ने 2029 तक आरक्षण लागू करने के लिए 2011 की जनगणना के आधार पर तत्काल परिसीमन (Delimitation) का प्रस्ताव रखा था।

विपक्ष की मुख्य आपत्तियां
विपक्ष (INDIA गठबंधन) ने एकजुट होकर इस बिल का विरोध किया, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे।

दक्षिण भारत का नुकसान: विपक्ष का तर्क है कि 2011 की जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाने से दक्षिण भारतीय और पूर्वोत्तर राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है।

ताजा जनगणना की मांग: कांग्रेस और अन्य दलों ने मांग की कि परिसीमन वर्तमान (2026-27) की जनगणना के आधार पर होना चाहिए, न कि 14 साल पुरानी (2011) जनगणना पर।

OBC उप-कोटा: विपक्ष की पुरानी मांग रही है कि 33% आरक्षण के भीतर ही OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) की महिलाओं के लिए अलग कोटा होना चाहिए।

धर्म और संघीय ढांचा: कुछ नेताओं ने इसे संघीय ढांचे पर हमला और राजनीतिक लाभ के लिए की गई “जल्दबाजी” बताया।

आगामी चुनावों और राजनीति पर प्रभाव
इस बिल के गिरने से भारतीय राजनीति में नया तनाव पैदा हो गया है।

2029 का कार्यान्वयन अनिश्चित: बिल के विफल होने से अब 2029 के आम चुनावों में महिला आरक्षण लागू हो पाएगा या नहीं, इस पर कानूनी अनिश्चितता बन गई है।

चुनावी मुद्दा: बीजेपी इसे महिलाओं के अधिकार के खिलाफ विपक्ष की “साजिश” के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष इसे दक्षिण भारत के अधिकारों की रक्षा और “जातिगत न्याय” के मुद्दे के रूप में देख रहा है।

सहयोगी विधेयकों की वापसी: इस बिल के गिरने के बाद सरकार को परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 को भी वापस लेना पड़ा है।

महिला आरक्षण बिल को लेकर पक्ष—विपक्ष आमने—सामने
पक्ष तर्क/स्थिति
सरकार (NDA) 2029 तक आरक्षण देने के लिए सीटों में वृद्धि और तत्काल परिसीमन जरूरी है।
विपक्ष (INDIA) बिना OBC कोटा और नई जनगणना के परिसीमन राज्यों के साथ अन्याय है।
नतीजा दो-तिहाई बहुमत की कमी से बिल रद्द; 106वां संशोधन (2023) अभी भी प्रभावी है, लेकिन लागू होना टल सकता है।

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