काठमांडू। नेपाल की राजनीति में मार्च 2026 में एक बड़ा बदलाव आया है। हाल के चुनावों के बाद बालेन शाह (बालेन्द्र शाह) ने नेपाल के नए प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला है। इस नई सरकार के आने से नेपाल की विदेश नीति, विशेष रूप से चीन के प्रति इसके रुख में महत्वपूर्ण बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!चीन के प्रति बदलता रुख और “विकास कूटनीति”
नेपाल की नई सरकार, जिसका नेतृत्व राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) कर रही है, ने चीन और भारत दोनों के साथ “संतुलित और गतिशील कूटनीति” (Balanced and Dynamic Diplomacy) अपनाने का संकल्प लिया है।

चीन के प्रभाव में कमी: विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों की पकड़ कमजोर होने से दक्षिण एशिया में चीन के प्रभाव को एक बड़ा झटका लगा है। पिछली सरकारों के विपरीत, नई सरकार किसी भी एक देश (चीन या भारत) की ओर झुकाव रखने के बजाय “विकास कूटनीति” पर ध्यान दे रही है।
बीआरआई (BRI) पर सावधानी: हालांकि चीन ने प्रधानमंत्री शाह को बधाई दी है और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई है, लेकिन नई सरकार भ्रष्टाचार और अपारदर्शी फंडिंग को लेकर सतर्क है। नेपाल अब बिना किसी राजनीतिक शर्त के निवेश और सहायता चाहता है।
भारत और पश्चिम के साथ संतुलन: नई सरकार भारत के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को फिर से परिभाषित करने और अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों के साथ भी सक्रिय जुड़ाव रखने की कोशिश कर रही है।
प्रमुख घटनाक्रम (मार्च 2026)
प्रधानमंत्री: बालेन शाह ने 27 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
विदेश नीति: “कैलिब्रेटेड न्यूट्रालिटी” (सटीक तटस्थता) के तहत नेपाल अब बहु-ध्रुवीय जुड़ाव की ओर बढ़ रहा है, ताकि किसी एक शक्ति का उस पर वर्चस्व न रहे।
चीन की प्रतिक्रिया: चीन ने आधिकारिक तौर पर नई सरकार का स्वागत किया है और संप्रभुता के सम्मान का आश्वासन दिया है, लेकिन वह अपनी पिछली नीतियों और निवेशों को लेकर नई चुनौतियों का सामना कर रहा है।
नेपाल अब चीन के “कम्युनिस्ट ब्लॉक” से बाहर निकलकर एक ऐसी स्वतंत्र नीति अपना रहा है, जहां राष्ट्रीय हित और आर्थिक लाभ सर्वोपरि हैं, न कि किसी विशेष देश के प्रति झुकाव की रणनीति है।
