वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक विवादित पत्र (रैंट) साझा किया है, जिसमें भारत और चीन को “नरक” (Hellhole) कहा गया है। यह पोस्ट मूल रूप से कट्टरपंथी रेडियो होस्ट माइकल सैवेज द्वारा लिखी गई थी, जिसे ट्रंप ने रीपोस्ट करके अपना समर्थन जताया है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!विवाद की मुख्य बातें
इस साझा किए गए पत्र में अमेरिका में जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) कानून पर तीखा हमला किया गया है। पत्र के जरिए कई आरोप लगाए गए हैं।
नागरिकता का दुरुपयोग: आरोप लगाया गया है कि भारत और चीन जैसे देशों के लोग “बर्थ टूरिज्म” का सहारा लेते हैं। वे गर्भावस्था के नौवें महीने में अमेरिका आते हैं ताकि वहां बच्चा पैदा हो और उसे तुरंत अमेरिकी नागरिकता मिल जाए।
“हेलहोल” टिप्पणी: पत्र में लिखा है कि एक बार बच्चा नागरिक बन जाता है, तो वे अपने पूरे परिवार को “चीन, भारत या दुनिया के किसी अन्य नरक (Hellhole)” से अमेरिका बुला लेते हैं।
“लैपटॉप वाले गुंडे”: सैवेज ने भारतीय और चीनी प्रवासियों को “गैंगस्टर्स विद लैपटॉप्स” (Laptop-wielding gangsters) कहकर संबोधित किया है और दावा किया है कि उन्होंने माफिया परिवारों से भी ज्यादा अमेरिका को नुकसान पहुंचाया है।
संविधान पर सवाल: पोस्ट में तर्क दिया गया है कि अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन (जो जन्म के आधार पर नागरिकता देता है) पुराना हो चुका है क्योंकि इसे हवाई यात्रा और इंटरनेट के युग से पहले लिखा गया था।
भारत में प्रतिक्रिया
ट्रंप के इस कदम से भारत में काफी नाराजगी देखी जा रही है।
विपक्ष का हमला: कांग्रेस पार्टी ने इसे बेहद अपमानजनक और “भारत-विरोधी” बताया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस पर औपचारिक विरोध दर्ज कराने की मांग की है।
विदेश मंत्रालय (MEA): भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने “रिपोर्ट्स देखी हैं,” लेकिन इस पर कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की।
ईरान की प्रतिक्रिया: ईरान के महावाणिज्य दूतावास ने भारत और चीन का बचाव करते हुए उन्हें “सभ्यता का पालना” बताया और ट्रंप की टिप्पणी की आलोचना की।
वर्तमान स्थिति
यह विवाद ऐसे समय में आया है जब ट्रंप प्रशासन जन्मसिद्ध नागरिकता को खत्म करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। वर्तमान में यह मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
अमेरिका में नागरिकता कानून
अमेरिका में जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) का मुद्दा इस समय कानूनी और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मोड़ पर है। डोनाल्ड ट्रंप के हालिया “नरक” वाले बयान और 14वें संशोधन को लेकर चल रहे विवाद से मामला और गरमा गया है।
14वां संशोधन और अमेरिकी कानून
अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन (14th Amendment), जो 1868 में लागू हुआ था, जन्मसिद्ध नागरिकता का आधार है।
नागरिकता का नियम: यह कहता है कि “अमेरिका में जन्मा या प्राकृतिक रूप से नागरिक बना हर व्यक्ति, जो अमेरिकी अधिकार क्षेत्र के अधीन है, अमेरिका और उस राज्य का नागरिक है जहाँ वह रहता है।”
ऐतिहासिक फैसला: 1898 के प्रसिद्ध ‘यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम अर्क’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अमेरिका में पैदा हुए बच्चों को नागरिकता मिलेगी, चाहे उनके माता-पिता विदेशी हों।
ट्रंप का तर्क: ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह कानून केवल गुलामी से मुक्त हुए लोगों के बच्चों के लिए था, न कि अवैध प्रवासियों या अल्पकालिक पर्यटकों (बर्थ टूरिज्म) के लिए।
वर्तमान कानूनी स्थिति (अप्रैल 2026)
ट्रंप ने जनवरी 2025 में कार्यभार संभालते ही एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसका उद्देश्य जन्मसिद्ध नागरिकता को समाप्त करना था।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: इस आदेश को निचली अदालतों द्वारा ब्लॉक किए जाने के बाद मामला अब सुप्रीम कोर्ट में ‘ट्रंप बनाम बारबरा’ के नाम से चल रहा है।
ऐतिहासिक क्षण: 1 अप्रैल 2026 को डोनाल्ड ट्रंप खुद सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में शामिल हुए, जो किसी भी पदस्थ राष्ट्रपति द्वारा एक दुर्लभ कदम था।
अंतिम फैसला: अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या राष्ट्रपति एक कार्यकारी आदेश के जरिए संविधान की सदियों पुरानी व्याख्या को बदल सकते हैं। फैसला जून 2026 के अंत तक आने की उम्मीद है।
प्रवासी समुदाय और भारतीयों पर प्रभाव
ट्रंप की “हेलहोल” (नरक) वाली टिप्पणी और उनके प्रस्तावित कानूनों ने भारतीय प्रवासियों में भारी चिंता और आक्रोश पैदा कर दिया है।
लाखों बच्चों पर असर: अनुमान है कि अमेरिका में हर साल पैदा होने वाले लगभग 2,50,000 बच्चों की नागरिकता खतरे में पड़ सकती है। इसमें केवल अवैध प्रवासी ही नहीं, बल्कि H-1B वीजा धारक और ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीय पेशेवर भी शामिल हैं।
भेदभाव का आरोप: भारतीय-अमेरिकी सांसदों और ACLU जैसे नागरिक अधिकार समूहों ने इसे “नस्लवादी” हमला बताया है। उनका कहना है कि यह उन लोगों को निशाना बना रहा है जो दशकों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था (विशेषकर टेक क्षेत्र) में योगदान दे रहे हैं।
अराजकता का डर: विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून के बदलने से हजारों बच्चे “स्टेटलेस” (बिना किसी देश के नागरिक) हो सकते हैं और प्रवासी परिवारों के लिए एक लंबी कानूनी अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
