नई दिल्ली। आर्कटिक में जमी हुई मिट्टी पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) के पिघलने से हजारों सालों से कैद कार्बन और अन्य खतरनाक गैसें बाहर निकल रही हैं। यह जलवायु परिवर्तन की दिशा में एक गंभीर ‘फीडबैक लूप’ (Feedback Loop) तैयार कर रहा है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!- कार्बन का विशाल भंडार
हजारों वर्षों का संचय: पर्माफ्रॉस्ट में मृत पौधों और जानवरों के अवशेष हजारों वर्षों से जमे हुए हैं, जो सड़ने के बजाय बर्फ में सुरक्षित रहे हैं।
वायुमंडल से दोगुना कार्बन: वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पर्माफ्रॉस्ट में लगभग 1,500 से 1,700 अरब टन कार्बन जमा है, जो वर्तमान में हमारे वायुमंडल में मौजूद कार्बन की मात्रा से लगभग दोगुना है।
- खतरनाक गैसों का उत्सर्जन
मीथेन और CO2: जैसे ही बर्फ पिघलती है, सूक्ष्मजीव इस कार्बनिक पदार्थ को खाना शुरू कर देते हैं, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैसें निकलती हैं।
मीथेन की शक्ति: मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में गर्मी को रोकने में 80 गुना से अधिक शक्तिशाली है, जो ग्लोबल वार्मिंग की प्रक्रिया को और तेज कर देती है।
- अन्य उभरते खतरे
जोंबी वायरस: बर्फ पिघलने से प्राचीन बैक्टीरिया और वायरस (जैसे एंथ्रैक्स) भी सक्रिय हो सकते हैं, जिनसे हजारों सालों से कोई संपर्क नहीं रहा है।
बुनियादी ढांचे का विनाश: जमीन के नरम और अस्थिर होने के कारण सड़कें, पाइपलाइन और इमारतें धंस रही हैं। रूस में एक ईंधन टैंक ढहने से 21,000 टन डीजल नदियों में फैल गया था।
नदियों का ‘जंग’ लगना: कुछ क्षेत्रों में नदियाँ लाल/नारंगी हो रही हैं क्योंकि पिघलते पर्माफ्रॉस्ट से आयरन और अन्य खनिज पानी में मिल रहे हैं, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रह जाता।
आर्कटिक दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे यह समस्या एक वैश्विक आपातकाल बनती जा रही है।
आर्कटिक (Arctic)
आर्कटिक (Arctic) पृथ्वी के सबसे उत्तरी भाग में स्थित एक ध्रुवीय क्षेत्र है। यह मुख्य रूप से आर्कटिक महासागर और उसके आस-पास के देशों (कनाडा, रूस, अमेरिका, नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन, फिनलैंड और आइसलैंड) के कुछ हिस्सों से मिलकर बना है।
भौगोलिक विशेषताएं
आर्कटिक महासागर: यह दुनिया का सबसे छोटा और उथला महासागर है, जो साल के अधिकांश समय बर्फ की परतों से ढका रहता है।
आर्कटिक वृत्त (Arctic Circle): यह लगभग उत्तर अक्षांश पर स्थित है। इसके उत्तर का पूरा क्षेत्र आर्कटिक कहलाता है।
टुंड्रा और पर्माफ्रॉस्ट: यहां की भूमि को टुंड्रा कहा जाता है, जहां जमीन के नीचे की बर्फ स्थायी रूप से जमी रहती है (पर्माफ्रॉस्ट)।
जलवायु और वन्यजीव
अत्यधिक ठंड: यहां का तापमान अक्सर शून्य से बहुत नीचे रहता है, जो इंसानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है।
अनोखे जीव: यहां ध्रुवीय भालू (Polar Bear), आर्कटिक लोमड़ी, सील और वालरस जैसे विशिष्ट जीव पाए जाते हैं।
ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव: आर्कटिक दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में लगभग चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे समुद्री बर्फ तेजी से पिघल रही है।
महत्व और राजनीति
प्राकृतिक संसाधन: बर्फ के नीचे तेल, प्राकृतिक गैस और खनिजों का विशाल भंडार होने का अनुमान है, जिसके कारण रूस और अमेरिका जैसे देशों के बीच यहाँ अपना प्रभुत्व जमाने की होड़ मची है।
आर्कटिक परिषद (Arctic Council): इस क्षेत्र के प्रबंधन और सहयोग के लिए आठ आर्कटिक देशों का एक समूह है।
भारत की भूमिका: भारत भी आर्कटिक में वैज्ञानिक अनुसंधान करता है और इसका ‘हिमाद्री’ (Himadri) नाम का एक अनुसंधान स्टेशन नॉर्वे के स्वालबार्ड में स्थित है।
