सतना। जिले के नागौद राजपरिवार की सदस्य संयोगिता सिंह पर एक महिला ने गोलीबारी की। महिला ने नौ राउंड फायरिंग की, जिसमें से एक गोली संयोगिता के पेट में लगी। उन्हें सतना के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया और बाद में गंभीर हालत में रीवा के एक मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल में रेफर कर दिया गया।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!जानकारी के मुताबिक, यह घटना गुरुवार को परसमनिया की ‘गढ़ी’ में हुई। पुलिस ने आरोपी सुनीता परिहार को गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि, लॉकअप में रखने के बजाय मुख्य आरोपी सुनीता सिंह को कुर्सी पर बैठने दिया गया। एक वीडियो सामने आया है जिसमें इस दौरान उसे कोल्ड ड्रिंक दी जा रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, संयोगिता सिंह नागौद से पूर्व मंत्री और BJP विधायक नागेंद्र सिंह के भतीजे रूपेंद्र सिंह (उर्फ बाबा राजा) की पत्नी हैं। बताया जाता है कि बाबा राजा और संयोगिता के बीच लंबे समय से पारिवारिक विवाद चल रहा था। इस विवाद को सुलझाने के लिए संयोगिता के माता-पिता, भाई और अन्य रिश्तेदार राजस्थान के उदयपुर से नागोद आए थे। गुरुवार को दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही थी, तभी विवाद बढ़ गया और माहौल तनावपूर्ण हो गया।

संयोगिता की मां नरेंद्र कुमारी ने बताया कि गढ़ी में मौजूद सुनीता परिहार नाम की महिला ने नौ राउंड फायरिंग की। उनका दामाद रूपेंद्र उस महिला से कहता रहा, “उसे गोली मारो, उसे गोली मारो…” एक गोली संयोगिता के पेट में लगी, जिससे वह गंभीर हालत में गिर पड़ीं। नरेंद्र कुमारी का आरोप है कि उनका दामाद बाबा राजा पिछले करीब सात साल से सुनीता परिहार के साथ रह रहा है। सुनीता तब उनके साथ रहने आई थी जब उनकी बेटी के ससुर का निधन हो गया था। उन्होंने कहा, “हम बातचीत करने आए थे। मेरे दामाद ने मेरी बेटी को बाहर धकेल दिया और दरवाजा बंद कर लिया। सुनीता ने खिड़की से गोली चलाई।” नरेंद्र कुमारी ने बताया कि संयोगिता की सर्जरी रात 1:00 बजे तक चली और शुक्रवार सुबह 10:00 बजे उन्हें होश आया। नरेंद्र कुमारी ने आरोप लगाया कि पिछले साल सुनीता दो बार उनकी बेटी संयोगिता की गर्दन पर बैठी थीं।
अस्पताल के अनुसार, सर्जरी के बाद संयोगिता सिंह की हालत में सुधार हुआ है। डॉक्टरों का कहना है कि वह खतरे से बाहर हैं। हालांकि, वह अभी भी डॉक्टरों की निगरानी में हैं। शाही परिवार के सदस्य और सहयोगी अस्पताल में मौजूद हैं। इस बीच, पुलिस ने घटना में इस्तेमाल की गई लाइसेंसी राइफल जब्त कर ली है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है। फायरिंग के हालात, गोली कैसे चली और घटना के असली कारणों का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच चल रही है।

खबरों के मुताबिक, जैसे ही संयोगिता को गोली लगी, उनके परिवार वाले गुस्से में आ गए और उन्होंने बाबा राजा की बुरी तरह पिटाई कर दी। गढ़ी (किलेनुमा हवेली) में मौजूद अन्य लोगों ने बीच-बचाव कर स्थिति को काबू में किया। परिवार वालों को शांत कराने से पहले काफी देर तक माहौल तनावपूर्ण रहा।
कई सालों से अलग रह रही थीं संयोगिता
शाही परिवार के करीबी सूत्रों का कहना है कि बाबा राजा और संयोगिता के बीच लंबे समय से अनबन चल रही थी। इसी वजह से संयोगिता ने कई साल पहले परसामनिया गढ़ी छोड़ दी थी और नागौद किले में रह रही थीं। हाल ही में उनका परिवार उदयपुर से नागौद आया था। इसके बाद वे उन्हें गुरुवार को परसामनिया गढ़ी ले गए, जहां बाबा राजा और सुनीता पहले से मौजूद थे। इस मुलाकात के दौरान विवाद बढ़ गया और आखिरकार गोलीबारी की घटना हो गई।
दरअसल, नागौद रियासत की स्थापना 1478 में हुई थी। इसके आखिरी शासक राजा महेंद्र सिंह जूदेव थे। उन्होंने 1950 में अपनी रियासत का भारतीय संघ में विलय कर दिया, जिसके बाद नागोद आजाद भारत का हिस्सा बन गया। राजा महेंद्र सिंह जूदेव ने दो शादियां की थीं। अपनी पहली पत्नी से उनके दो बेटे थे-रुद्रेंद्र प्रताप सिंह (युवराज) और शैलेंद्र सिंह ‘शैलू’। इसके बाद उन्होंने दिवंगत पूर्व सांसद दादा सुखेंद्र सिंह की बहन से शादी की। इस विवाह से नागेंद्र सिंह, रामदेव सिंह, कांतिदेव सिंह, रंतिदेव सिंह और छत्रपाल सिंह का जन्म हुआ। समय के साथ नागौद रियासत की जागीरें राजा महेंद्र सिंह जूदेव की दोनों पत्नियों के बेटों के बीच बांट दी गईं।
समय के साथ, नागोद रियासत की जागीरें राजा महेंद्र सिंह जूदेव की दो पत्नियों के बेटों के बीच बांट दी गईं। नागोद और उसके आस-पास का इलाका रुद्रेंद्र प्रताप सिंह (जिन्हें युवराज के नाम से जाना जाता था) और उनके भाई को मिला, जबकि मौजूदा विधायक नागेंद्र सिंह को श्याम नगर की जागीर मिली। इसी तरह, दूसरे भाइयों को उचेहरा इलाके में अलग-अलग जागीरें दी गईं। कांतिदेव सिंह को परसमनिया, तुसगावां और महाराजपुर की जागीरें मिलीं। उन्होंने परसमनिया में एक गढ़ी (किलेनुमा घर) बनवाई और अपने बेटे रूपेंद्र सिंह (बाबा राजा) के साथ वहीं रहने लगे।
नागौद रियासत
नागौद रियासत (जिसे ‘नागोड`’ और ‘नागौद’ के नाम से भी जाना जाता है) मप्र के आधुनिक सतना जिले में स्थित ब्रिटिशकालीन भारत का एक रियासत था। 18वीं शताब्दी तक रियासत को उसकी राजधानी उचेहरा के मूल नाम ‘उचेहरा’ से भी जाना जाता था।
1478 में, राजा भोजराज जूदेव ने उचेहराकल्प (वर्तमान में उचेहरा शहर) की स्थापना की थी, जिसे उन्होंने तेली राजाओं से नारो के किले पर कब्जा कर प्राप्त की थी। 1720 में रियासत को अपनी नई राजधानी के नाम पर नागौद नाम दिया गया। 1807 में नागौद, पन्ना रियासत के अन्तर्गत आता था और उस रियासत को दिए गए सनद में शामिल था। हालांकि, 1809 में, शिवराज सिंह को उनके क्षेत्र में एक अलग सनद द्वारा मान्यता प्राप्ति की पुष्टि हुई थी। नागौद रियासत, 1820 में बेसिन की संधि के बाद एक ब्रिटिश संरक्षक बन गया। राजा बलभद्र सिंह को अपने भाई की हत्या के लिए 1831 में पदच्युत कर दिया गया था।
फिजुलखर्ची और वेबन्दोबस्ती के कारण में रियासत पर बहुत कर्ज हो गया और 1844 में ब्रिटिश प्रशासन ने आर्थिक कुप्रबंधन के कारण प्रशासन को अपने हाथ में ले लिया। नागौद के शासक 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान अंग्रेजों के वफादार बने रहे फलस्वरूप उन्हें धनवाल की परगना दे दी गई। 1862 में राजा को गोद लेने की अनुमति देने वाले एक सनद प्रदान किया गया और 1865 में वहां का शासन पुनः राजा को दे दिया गया। नागौद रियासत 1871 से 1931 तक बघेलखण्ड एजेंसी का एक हिस्सा रहा, फिर इसे अन्य छोटे राज्यों के साथ बुंदेलखंड एजेंसी को स्थानांतरित कर दिया गया। नागौद के अंतिम राजा, एचएच श्रीमंत महेंद्रसिंह ने 1 जनवरी 1950 को भारतीय राज्य में अपने रियासत के विलय पर हस्ताक्षर किए।
नागौद रियासत की राजधानी “नागौद” सतना जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर अमरन नदी के किनारे स्थित हैं। इसका क्षेत्रफल 501 वर्गमील है। रियासत का सम्पूर्ण भाग, विन्ध्याचल पठार पर स्थित है। रियासत में मुख्य रूप से टौंस, सतना, अमरन, महानदी आदि नदियां है। रियासत तीन तहसिलों में बटा हुआ था नागौद, उचेहरा, और धनवाही। राज्य का एक तिहाई भाग पवाई और जांगीरों में बटा हुआ था। रियासत में कुल 401 मौजे थी।
