–मनरेगा योजना के तहत गौशाला निर्माण में अनियमितताओं का आरोप
-27.38 लाख का बिल, 20.22 लाख रुपए का भुगतान; मौके पर अधूरा निर्माण मिलने का दावा
रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले में मनरेगा योजना के तहत गौशाला निर्माण कार्य में कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने तत्कालीन अधिकारियों, इंजीनियरों और ठेकेदार के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कर विवेचना में लिया है। EOW के अनुसार, जांच में निविदा प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी, निर्माण कार्य में अनियमितताओं और सरकारी राशि के भुगतान से जुड़े गंभीर आरोप सामने आए हैं।
बिना खुली निविदा प्रक्रिया के ठेका देने का आरोप
EOW के मुताबिक, रीवा जिले के विभिन्न विकासखंडों में निराश्रित गोवंश की देखरेख के लिए मनरेगा योजना के माध्यम से गौशाला निर्माण स्वीकृत किया गया था। डभौरा यूनिट-3, नगर परिषद डभौरा में निर्माण कार्य ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES), संभाग क्रमांक-2, रीवा के माध्यम से कराया जाना था। आरोप है कि संबंधित अधिकारियों ने पारदर्शी ओपन टेंडर प्रक्रिया अपनाने के बजाय कथित रूप से अपने पसंदीदा ठेकेदार मेसर्स दीनदयाल कुशवाहा, छतरपुर को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से प्रक्रिया में अनियमितताएं कीं।
एक ही कार्य के लिए अलग-अलग तारीखों में निविदाएं
EOW की जांच के अनुसार, एक ही निर्माण कार्य के लिए कार्यालयीन रिकॉर्ड में 3 दिसंबर 2020 और 31 दिसंबर 2020 की अलग-अलग तारीखों में फर्जी एवं कूटरचित संक्षिप्त निविदाएं तैयार किए जाने का आरोप है।यह भी कहा गया है कि निविदा प्रक्रिया के तहत न तो निविदा प्रपत्र शुल्क जमा कराया गया और न ही आवश्यक अमानत राशि (EMD) जमा कराई गई। इसके बावजूद ठेकेदार को कार्य आवंटित कर दिया गया।
28 सामग्री आपूर्तिकर्ताओं से कोटेशन, लेकिन केवल 9 की दरें
जांच में सामने आए तथ्यों के अनुसार, निर्माण सामग्री की आपूर्ति के लिए 28 सामग्री आपूर्तिकर्ताओं से कोटेशन मांगे गए थे, लेकिन ठेकेदार की ओर से केवल 9 सामग्री आपूर्तिकर्ताओं की दरें प्रस्तुत की गईं। इसके बाद तुलनात्मक पत्रक तैयार कर मेसर्स दीनदयाल कुशवाहा को न्यूनतम दर वाला एल-1 घोषित कर कार्यादेश जारी किए जाने का आरोप है। EOW के अनुसार, इस प्रक्रिया में अनियमितता कर ठेकेदार को लाभ पहुंचाने की आशंका सामने आई है।
27.38 लाख रुपए का बिल, 20.22 लाख रुपए का भुगतान
बताया गया है कि मनरेगा पोर्टल पर कुल 27,38,578.22 रुपए के बिल प्रस्तुत किए गए थे। इनमें से 20,22,020 रुपए का भुगतान भी प्राप्त कर लिया गया। हालांकि, भौतिक सत्यापन के दौरान निर्माण स्थल पर केवल लगभग 80 × 25 फीट की अर्धनिर्मित बाउंड्रीवॉल और एक अधूरा भवन मिलने की बात कही गई है। विज्ञप्ति के अनुसार, गौशाला के लिए आवश्यक शेड, पानी की टंकी, नलकूप और अन्य जरूरी निर्माण कार्य मौके पर नहीं पाए गए। इस तरह, स्वीकृत निर्माण कार्य और मौके पर मिली वास्तविक स्थिति के बीच अंतर होने का आरोप लगाया गया है। EOW ने इसे सरकारी राशि के संभावित दुरुपयोग से जुड़ा गंभीर मामला बताया है।
इन अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ प्रकरण
- राजेन्द्र सिंह धुर्वे: तत्कालीन कार्यपालन यंत्री, संभाग क्रमांक-1 एवं प्रभारी कार्यपालन यंत्री, संभाग क्रमांक-2, रीवा।
- डीएस आर्य — तत्कालीन कार्यपालन यंत्री, संभाग क्रमांक-2, रीवा।
- हिमांशु तिवारी — तत्कालीन कार्यपालन यंत्री, संभाग क्रमांक-3, सीधी।
- जगदीश सिंह राजपूत — तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी, अनुभाग मऊगंज।
- लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला — तत्कालीन सहायक ग्रेड-3 एवं प्रभारी निविदा शाखा, संभाग क्रमांक-2, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, रीवा।
- दीनदयाल कुशवाहा — प्रोपराइटर, मेसर्स दीनदयाल कुशवाहा फर्म, छतरपुर।
इन व्यक्तियों और अन्य संबंधित लोगों के विरुद्ध कथित अनियमितताओं के संबंध में कार्रवाई की जानकारी दी गई है। आरोपों का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।
इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला?
EOW की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420, 467, 468, 471 और 120(बी) के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित अधिनियम 2018) की धाराओं 7(सी), 13(1)(ए) और 13(2) के अंतर्गत आपराधिक प्रकरण दर्ज कर विवेचना में लिया गया है।
जांच के बाद सामने आएंगे अन्य तथ्य
रीवा जिले में गौशाला निर्माण के लिए जारी सरकारी राशि और मौके पर उपलब्ध निर्माण कार्य के बीच कथित अंतर का मामला सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण है। EOW द्वारा प्रारंभिक जांच के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है। अब विवेचना के दौरान निविदा प्रक्रिया, भुगतान संबंधी दस्तावेजों, निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाएगी।
