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AI की ऊर्जा खपत को 70% तक कम कर सकती है यह नई दिमाग जैसी चिप

aaptak.co.in1@gmail.com April 23, 2026
ai chip

रिसर्च डेसक। वैज्ञानिकों ने एक नए तरह का नैनोइलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बनाया है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ऊर्जा की मात्रा को काफी हद तक कम कर सकता है। यह इनोवेशन इस तरह काम करता है कि यह इंसानी दिमाग के जानकारी प्रोसेस करने के तरीके की नकल करता है, और आज के ज्यादा बिजली खाने वाले AI हार्डवेयर का एक ज्यादाद असरदार विकल्प देता है।

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यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के नेतृत्व वाली रिसर्च टीम ने हैफनियम ऑक्साइड का एक बदला हुआ वर्शन बनाया है, जो एक बहुत ही स्थिर, कम ऊर्जा वाले ‘मेमरिस्टर’ के तौर पर काम करता है। यह एक ऐसा कंपोनेंट है, जिसे दिमाग में न्यूरॉन्स के जुड़ने और बातचीत करने के तरीके की नकल करने के लिए डिजाइन किया गया है। उनके नतीजे ‘साइंस एडवांसेज़’ नाम के जर्नल में छपे थे।

मौजूदा AI सिस्टम इतनी ज्यादाद ऊर्जा क्यों इस्तेमाल करते हैं?

आधुनिक AI पारंपरिक कंप्यूटर चिप्स पर निर्भर करता है, जो लगातार मेमोरी और प्रोसेसिंग यूनिट्स के बीच डेटा को इधर-उधर करते रहते हैं। इस आने-जाने वाले ट्रांसफर के लिए बहुत ज्यादा बिजली की जरूरत होती है, और जैसे-जैसे AI का इस्तेमाल अलग-अलग इंडस्ट्रीज में ज्यादा होता जा रहा है, इसकी मांग भी लगातार बढ़ती जा रही है।

न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग एक अलग तरीका पेश करती है। मेमोरी और प्रोसेसिंग को अलग-अलग करने के बजाय, यह दोनों को एक ही जगह पर मिला देती है, ठीक वैसे ही जैसे दिमाग काम करता है। यह तरीका ऊर्जा की खपत को 70% तक कम कर सकता है, साथ ही सिस्टम को ज़्यादा स्वाभाविक तरीके से सीखने और खुद को ढालने की सहूलियत भी देता है।

कैम्ब्रिज के मटीरियल्स साइंस और मेटलर्जी विभाग के मुख्य लेखक डॉ. बखित ने कहा, “ऊर्जा की खपत मौजूदा AI हार्डवेयर की मुख्य चुनौतियों में से एक है।” “इस समस्या को हल करने के लिए, आपको ऐसे डिवाइस चाहिए जिनमें बहुत कम करंट हो, बेहतरीन स्थिरता हो, स्विचिंग साइकिल्स और डिवाइस के बीच ज़बरदस्त एकरूपता हो, और कई अलग-अलग स्थितियों के बीच स्विच करने की क्षमता हो।”

मेमरिस्टर डिजाइन का एक नया तरीका

ज्यादातर मौजूदा मेमरिस्टर मेटल ऑक्साइड मटीरियल्स के अंदर छोटे-छोटे कंडक्टिव फिलामेंट्स बनाकर काम करते हैं। ये फिलामेंट्स अक्सर अप्रत्याशित तरीके से काम करते हैं और इनके लिए अक्सर ज्यादा वोल्टेज की जरूरत होती है, जिससे बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग के लिए इनकी उपयोगिता सीमित हो जाती है।

कैम्ब्रिज के शोधकर्ताओं ने एक अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने हैफनियम पर आधारित एक पतली फिल्म तैयार की जो एक ज्यादा नियंत्रित तरीके से अपनी स्थिति बदलती है। स्ट्रॉन्शियम और टाइटेनियम मिलाकर और दो-चरणों वाली विकास प्रक्रिया का इस्तेमाल करके, उन्होंने परतों के बीच के इंटरफेस पर छोटे इलेक्ट्रॉनिक गेट बनाए, जिन्हें ‘p-n जंक्शन’ के नाम से जाना जाता है।

फिलामेंट्स के बनने और टूटने पर निर्भर रहने के बजाय, यह डिवाइस इन इंटरफेस पर ऊर्जा की रुकावट को समायोजित करके अपना प्रतिरोध बदलता है। इससे स्विचिंग ज्यादा सुचारू और भरोसेमंद हो पाती है। कैम्ब्रिज के इंजीनियरिंग विभाग से भी जुड़े बखित ने बताया कि यह डिज़ाइन मेमरिस्टर के विकास में एक बड़ी समस्या को हल करता है। उन्होंने कहा, “फिलामेंटरी डिवाइसों में अनियमित व्यवहार की समस्या होती है।” क्योंकि हमारे डिवाइस इंटरफेस पर स्विच करते हैं, इसलिए वे एक साइकिल से दूसरी साइकिल और एक डिवाइस से दूसरे डिवाइस में बेहतरीन एकरूपता दिखाते हैं।”

अल्ट्रा-लो पावर और दिमाग जैसी सीखने की क्षमता

परीक्षणों से पता चला कि ये नए डिवाइस कुछ पारंपरिक ऑक्साइड-आधारित मेमरिस्टरों की तुलना में लगभग दस लाख गुना कम स्विचिंग करंट पर काम करते हैं। वे सैकड़ों स्थिर कंडक्टेंस स्तर भी हासिल कर सकते हैं, जो एनालॉग ‘इन-मेमोरी’ कंप्यूटिंग के लिए जरूरी है।

प्रयोगशाला प्रयोगों में, ये डिवाइस दसियों हज़ार स्विचिंग साइकिलों तक स्थिर रहे और लगभग एक दिन तक अपनी प्रोग्राम की गई स्थिति बनाए रखी। उन्होंने सीखने के कुछ मुख्य जैविक व्यवहार भी दिखाए, जिसमें ‘स्पाइक-टाइमिंग डिपेंडेंट प्लास्टिसिटी’ भी शामिल है। यह वह प्रक्रिया है जो न्यूरॉन्स को समय के आधार पर अपने कनेक्शन को मज़बूत या कमज़ोर करने की अनुमति देती है।बखित ने कहा, “अगर आप ऐसा हार्डवेयर चाहते हैं जो सिर्फ बिट्स स्टोर करने के बजाय सीख सके और खुद को ढाल सके, तो आपको इन्हीं गुणों की ज़रूरत होगी।”

बची हुई चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं

इन आशाजनक परिणामों के बावजूद, अभी भी कुछ बाधाएं हैं, जिन्हें पार करना बाकी है। मौजूदा निर्माण प्रक्रिया के लिए लगभग 700°C तापमान की ज़रूरत होती है, जो कि मानक सेमीकंडक्टर निर्माण प्रक्रिया में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले तापमान से कहीं ज्यादा है।

बखित ने कहा, “फिलहाल हमारे डिवाइस निर्माण प्रक्रिया में यही सबसे बड़ी चुनौती है।” “लेकिन अब हम तापमान को कम करने के तरीकों पर काम कर रहे हैं ताकि इसे मानक औद्योगिक प्रक्रियाओं के साथ ज़्यादा अनुकूल बनाया जा सके।”

अगर इस समस्या को हल किया जा सके, तो इस तकनीक को व्यावहारिक चिप-स्तरीय प्रणालियों में एकीकृत किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “अगर हम तापमान कम कर सकें और इन डिवाइसों को एक चिप पर लगा सकें, तो यह एक बहुत बड़ा कदम होगा।”

इस सफलता के पीछे सालों का प्रयोग और त्रुटि का अनुभव

यह प्रगति कई सालों के प्रयोगों और कई असफलताओं के बाद हासिल हुई। बखित ने बताया कि पिछले साल के अंत में जब उन्होंने निर्माण प्रक्रिया में बदलाव किया, तब जाकर प्रगति की गति तेज हुई; उन्होंने पहली परत बनने के बाद ही उसमें ऑक्सीजन मिलाई। उन्होंने कहा, “मैंने इस पर लगभग तीन साल बिताए।” “इसमें बहुत सारी असफलताएं मिलीं। लेकिन नवंबर के आखिर में, हमें पहली बार सचमुच अच्छे नतीजे देखने को मिले। बेशक, अभी तो इसकी शुरुआत ही है, लेकिन अगर हम तापमान से जुड़ी समस्या को हल कर पाए, तो यह टेक्नोलॉजी गेम-चेंजिंग साबित हो सकती है, क्योंकि इसमें ऊर्जा की खपत बहुत कम है और साथ ही, डिवाइस का परफॉर्मेंस भी काफी उम्मीद जगाने वाला है।” इस काम में स्वीडिश रिसर्च काउंसिल (VR), रॉयल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग और रॉयल सोसाइटी से आंशिक सहयोग मिला।

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