भोपाल। मप्र विधानसभा में मंगलवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया। सदन में विपक्ष के हंगामे के बीच सीएम डॉ. मोहन यादव ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा, जो हिंदू की बात करेगा, वही राज करेगा। समानता भारतीय संस्कृति का मूल है और भगवान की दृष्टि में सभी समान हैं, इसलिए कानून भी सभी नागरिकों के लिए एक जैसा होना चाहिए। यूसीसी लागू होने के बाद विवाह, तलाक, लिव-इन रिलेशनशिप, उत्तराधिकार और महिलाओं व बच्चों के अधिकारों से जुड़े कई नए प्रावधान लागू होंगे।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!यूसीसी सभी समुदायों में सिर्फ एक ही शादी (मोनोगैमी) को अनिवार्य बनाती है। कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है। विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है। अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच विवाह पर रोक लगाई गई है। मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैरकानूनी घोषित किया गया है। अब विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है।
निकाह-हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक
मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने शादी के समय किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है। साथ ही संहिता में लोगों के लिए शादी और तलाक दोनों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है। शहरी क्षेत्रों में मप्र ई-नगर पालिका पोर्टल और ग्रामीण क्षेत्रों में एसडीएम, नपा या पंचायत के जरिए यह प्रक्रिया पूरी होगी। रजिस्ट्रेशन न होने से शादी अमान्य नहीं होगी, लेकिन रजिस्ट्रार द्वारा बिना ठोस लिखित कारण के आवेदन खारिज करने पर जुर्माने का प्रावधान है। तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए ‘निकाह-हलाला’ जैसी अपमानजनक या नीचा दिखाने वाली शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना एक दंडनीय आपराधिक अपराध माना जाएगा।
सभी बच्चों को समान दर्जा
बच्चों के अधिकार और कस्टडी को लेकर संहिता में अवैध संतान की अवधारणा समाप्त कर दी गई है। विवाह, लिव-इन, गोद लेने, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) से जन्मे सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा मिलेगा। अभिरक्षा के मामलों में अदालत बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देगी।
उत्तराधिकार में भी समान अधिकार
बेटे और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं, उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो। मृतक की संपत्ति में विधवाओं और विधुरों के साथ भी समान व्यवहार होगा। जीवित माता और पिता दोनों को क्लास-1 का उत्तराधिकारी माना गया है और वे मृतक बच्चे की संपत्ति में जीवनसाथी और बच्चों के साथ बराबर का हिस्सा पाएंगे। कोई भी वयस्क अपनी स्वयं अर्जित या पैतृक संपत्ति की 100 प्रतिशत वसीयत अपनी इच्छा से कर सकेगा। हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी व्यक्ति उत्तराधिकार का अधिकार खो देगा और यदि कोई कानूनी वारिस नहीं होगा तो संपत्ति राज्य के पास चली जाएगी।
लिव-इन के मामलों में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास ‘लिव-इन रिलेशनशिप का बयान’ जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। पार्टनर्स की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। वे प्रतिबंधित श्रेणी में न हों, पहले से विवाहित न हों और उनकी सहमति स्वतंत्र होनी चाहिए। यदि कोई पार्टनर 21 साल से कम उम्र का है, तो लिव-इन के शुरू होने और खत्म होने की जानकारी उनके माता-पिता/अभिभावकों को भेजी जाएगी। रजिस्ट्रार यह रिकॉर्ड स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी भेजेगा। लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उन्हें पूर्ण उत्तराधिकार मिलेगा। यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकती है।
सजा के क्या प्रावधान?
बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से ज़्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 जुर्माना हो सकता है। गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 जुर्माना तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 का जुर्माना हो सकता है।
अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं
संवैधानिक सुरक्षा-कवच का सम्मान करते हुए यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (खंड 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों (जैसे भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया) पर लागू नहीं होगा। जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा संविधान के भाग 21 के तहत की गई है, उन्हें भी इस कोड से विशेष रूप से बाहर रखा गया है। संहिता की परिभाषा वाला हिस्सा इसके अधिकार क्षेत्र को तय करता है। उत्तराधिकार से जुड़े जिन शब्दों की परिभाषा इसमें नहीं है, उनके लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 के अर्थ मान्य होंगे।
विपक्ष के हंगामे के बीच ध्वनिमत से पारित
सदन में विपक्ष के तीखे विरोध और वॉकआउट के प्रयासों के बीच स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर ने सदन की कार्यवाही जारी रखते हुए विधेयक को पास घोषित कर दिया। इसके पहले नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने बिल का कड़ा विरोध करते हुए इसे विस्तृत समीक्षा के लिए प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) के पास भेजने की मांग की। हालांकि, सरकार ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया, जिसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोक-झोंक शुरू हो गई।
यूसीसी बिल पास, अब राज्यपाल की मंजूरी का इंतजार
विधानसभा से यूसीसी विधेयक पारित होने के बाद इसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के बाद इसका राजपत्र (गजट) में नोटिफिकेशन होगा। इसके साथ ही मप्र में यूसीसी लागू हो जाएगा। सरकार की तैयारी के मुताबिक, इसके जुलाई में ही प्रभावी होने की संभावना है।
यूसीसी के विरोध में सांकेतिक नाटक का मंचन
सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले भी कांग्रेस ने यूसीसी के विरोध में सांकेतिक नाटक का मंचन किया। इसके जरिए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार और आरएसएस युवाओं, छात्रों, किसानों और जनहित के मुद्दों पर निष्क्रिय रहते हैं, लेकिन हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद और भारत-पाकिस्तान जैसे सांप्रदायिक मुद्दों पर तुरंत सक्रिय हो जाते हैं।
