हेल्थ डेस्क। यह बात हाल के कुछ शोधों (मार्च 2026) में सामने आई है, लेकिन यह केवल उन लोगों के लिए सही हो सकती है, जिनमें अल्जाइमर का आनुवंशिक (genetic) जोखिम अधिक है। सामान्य तौर पर, मांस का अत्यधिक सेवन अभी भी कई बीमारियों के जोखिम से जुड़ा हुआ है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!विशिष्ट जीन वाले लोगों के लिए फायदेमंद
स्वीडन में हुए एक नए अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों में APOE4 जीन (जो अल्जाइमर का मुख्य जोखिम कारक है) पाया जाता है, उनमें अधिक मांस खाने से याददाश्त कम होने और डिमेंशिया (dementia) का खतरा कम देखा गया।
प्रोसेस्ड (Processed) बनाम अनप्रोसेस्ड मीट
अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि केवल बिना प्रोसेस किया हुआ मीट (जैसे ताजा मटन या चिकन) ही इस आनुवंशिक समूह के लिए सुरक्षात्मक हो सकता है। सॉसेज, बेकन या हॉट डॉग जैसे प्रोसेस्ड मीट खाने से अल्जाइमर और अन्य मानसिक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
सामान्य आबादी के लिए जोखिम
जिन लोगों में यह विशेष जीन नहीं है, उनके लिए मांस का अधिक सेवन दिमाग के लिए कोई विशेष फायदा नहीं दिखाता है। इसके उलट, हार्वर्ड और अन्य संस्थानों के शोध बताते हैं कि रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट का ज्यादा सेवन डिमेंशिया के जोखिम को बढ़ा सकता है।
पोषक तत्व
मांस में विटामिन B12, आयरन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व होते हैं, जो मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं। कुछ अध्ययनों का मानना है कि जो लोग बहुत ही कम (हफ्ते में एक बार से कम) मांस खाते हैं, उनमें भी याददाश्त संबंधी समस्याओं का जोखिम हो सकता है।
सावधानी: यह शोध अभी शुरुआती स्तर पर है और इसे पूरी तरह साबित करने के लिए और अधिक नैदानिक परीक्षणों (clinical trials) की आवश्यकता है। डॉक्टर अभी भी हृदय और मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए मांस की जगह नट्स, फलियां और मछली जैसे प्रोटीन स्रोतों को प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं।
दुनियाभर में अल्जाइमर के मरीज
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अल्जाइमर डिजीज इंटरनेशनल (ADI) की रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर में अल्जाइमर और डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के मरीजों की स्थिति चिंताजनक है। अल्जाइमर, डिमेंशिया का सबसे सामान्य रूप है, जो कुल मामलों में 60% से 80% की हिस्सेदारी रखता है।
वैश्विक और भारत के आंकड़े
दुनियाभर में मरीज: विश्व स्तर पर 5.5 करोड़ (55 मिलियन) से अधिक लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं।
भारत की स्थिति: भारत में अल्जाइमर के लगभग 88 लाख से 90 लाख (9 मिलियन) मरीज हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक भारत में यह संख्या बढ़कर 1.4 करोड़ तक पहुंच सकती है।
नए मामले: दुनिया में हर 3 सेकंड में एक व्यक्ति डिमेंशिया का शिकार हो रहा है।
प्रमुख तथ्य और जोखिम
प्रभावित देश: डिमेंशिया के 60% से अधिक मरीज निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। फिनलैंड में अल्जाइमर की दर सबसे अधिक देखी गई है (प्रति 1 लाख पर 54.65 मामले)।
आयु कारक: यह मुख्य रूप से 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों को प्रभावित करता है, हालांकि यह बुढ़ापे का सामान्य हिस्सा नहीं है।
जीवन प्रत्याशा: निदान (Diagnosis) के बाद मरीज औसतन 3 से 11 वर्ष तक जीवित रहते हैं, हालांकि कुछ मामलों में यह 20 वर्ष से अधिक भी हो सकता है।
देखभाल का बोझ: एक मरीज की देखभाल के लिए परिवार के कम से कम 1-2 सदस्यों (केयर गिवर्स) का पूरा समय समर्पित होता है, जिससे यह एक सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन जाती है।
बचाव और जागरूकता: अभी तक अल्जाइमर का कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन शुरुआती पहचान और दवाओं से इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, शारीरिक सक्रियता, धूम्रपान न करना, स्वस्थ आहार और रक्तचाप व शुगर को नियंत्रित रखकर इसके जोखिम को कम किया जा सकता है।
