धार/भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ द्वारा धार भोजशाला को मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर घोषित करने के ऐतिहासिक फैसले का मुख्य आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट बनी है। कोर्ट ने अपने 242 पन्नों के फैसले में एएसआई की वैज्ञानिक खोजों, ऐतिहासिक साहित्यिक साक्ष्यों और राजस्व रिकॉर्ड को जीत का मुख्य जरिया माना है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!हाईकोर्ट के निर्णय के पीछे एएसआई रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के प्रमुख बिंदु
- एएसआई का वैज्ञानिक सर्वे और उत्खनन: मंदिर के अवशेषों से निर्माण: एएसआई की वैज्ञानिक जांच और सीमित उत्खनन रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि वर्तमान में खड़ी संरचना का निर्माण पहले से मौजूद हिंदू मंदिरों के हिस्सों को तोड़कर किया गया था।
वास्तुशिल्प घटक: मस्जिद की बनावट में इस्तेमाल किए गए खंभे (pillars) और बीम जैसे वास्तुशिल्प घटक प्राचीन मंदिर संरचनाओं के पाए गए हैं, जिन्हें बाद में पुन: उपयोग में लाया गया। - ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्यराजा भोज का काल: कोर्ट के सामने पेश ऐतिहासिक साहित्य से यह प्रमाणित हुआ कि इस विवादित परिसर का चरित्र परमार वंश के राजा भोज (1034 ईस्वी) से जुड़ा है। संस्कृत शिक्षा केंद्र: ऐतिहासिक संदर्भों ने स्पष्ट किया कि यह मूल रूप से संस्कृत शिक्षा का एक बड़ा गुरुकुल (विश्वविद्यालय) और देवी सरस्वती का पवित्र मंदिर था।
- सरकारी राजस्व रिकॉर्ड” भोजशाला और मंदिर” दर्ज: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पेश किए गए पुराने राजस्व रिकॉर्ड्स (Revenue Records) कोर्ट में बेहद अहम साबित हुए। वर्ष 1935-1936 तक के सभी आधिकारिक सरकारी एंट्रीज में इस विवादित परिसर को ‘जामा मस्जिद’ के बजाय “भोजशाला और मंदिर” (Bhojshala & Temple) के रूप में ही दर्शाया गया था।
- कानूनी और अन्य आधारअयोध्या फैसले के सिद्धांत: हाई कोर्ट ने इस फैसले को तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के 2019 के प्रसिद्ध अयोध्या मामले के 10 सिद्धांतों को अपना कानूनी आधार बनाया।
कमल मौला की मजार बाद की: कोर्ट ने पाया कि सूफी संत कमालुद्दीन (कमल मौला) का मकबरा परिसर में कई सदियों के बाद बनाया गया था, जिससे मूल धार्मिक चरित्र नहीं बदलता।
कोई वैध वक्फ नहीं: मुस्लिम पक्ष का संपत्ति पर वक्फ कानून के तहत दावा कानूनी रूप से खारिज कर दिया गया।
इसी एएसआई रिपोर्ट और पुख्ता वैज्ञानिक सबूतों को आधार मानते हुए हाई कोर्ट ने साल 2003 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज और हिंदुओं को केवल मंगलवार को पूजा की अनुमति थी। कोर्ट ने अब हिंदुओं को पूर्ण पूजा अधिकार दिया है और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए अलग भूमि आवंटित करने का सुझाव दिया है।
धार भोजशाला विवाद
धार (मध्य प्रदेश) स्थित भोजशाला का इतिहास लगभग 1,000 साल पुराना है, जिसे परमार वंश के राजा भोज (1000-1055 ईस्वी) द्वारा सरस्वती सदन (वाग्देवी मंदिर) के रूप में स्थापित किया गया था। यह प्राचीन विद्या केंद्र और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख स्थान था। यह स्थल हिंदू पक्ष के लिए माता सरस्वती का मंदिर और मुस्लिम पक्ष के लिए कमाल मौला मस्जिद का विवादित स्थल है।
भोजशाला का ऐतिहासिक सफर
स्थापना: 1034 ईस्वी में परमार राजा भोज ने धार में इसे स्थापित किया, जो ज्ञान और कला का केंद्र था।
सरस्वती प्रतिमा: मान्यता है कि यहां देवी सरस्वती (वाग्देवी) की मूर्ति स्थापित थी, जिसे बाद में अंग्रेजों के समय लंदन (ब्रिटिश म्यूजियम) ले जाया गया।
इस्लामी काल: 14वीं-15वीं शताब्दी में धार पर विजय के बाद, अलाउद्दीन खिलजी और बाद में दिलावर खान गौरी के शासनकाल में इस संरचना को क्षति पहुंचाई गई और मस्जिद का रूप दिया गया।
पुरातात्विक खोज: 1900 के दशक की शुरुआत में, के.के. लेले ने परिसर में संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों की खोज की, जो इस स्थल के हिंदू मंदिर होने के प्रमाण माने जाते हैं।
वर्तमान स्थिति (2026): भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में यह स्मारक है। 7 अप्रैल 2003 के आदेश के तहत, हिंदू समुदाय हर मंगलवार और वसंत पंचमी पर पूजा कर सकता है, जबकि मुस्लिम समुदाय शुक्रवार को नमाज पढ़ सकता है।
हाईकोर्ट का निर्णय (2026): मई 2026 में, हाई कोर्ट ने ASI के 2003 के आदेश को रद्द करते हुए मौजूदा विवाद के बीच इसे मुख्य रूप से एक मंदिर माना और आगे की कानूनी कार्यवाही जारी रखी है।
