भोपाल। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम ‘प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया 2024Ó रिपोर्ट के अनुसार, उप्र की जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का दबाव बना हुआ है। हालांकि, दिल्ली (194.6 फीसदी) और मप्र (147.1 फीसदी) जैसे राज्यों की तुलना में उप्र की स्थिति में कुछ सुधार देखा गया है। मध्य प्रदेश की जेलों में क्षमता से 152 फीसदी अधिक कैदियों के बोझ से जूझ रही हैं, जहां 133 जेलों में 30,764 की निर्धारित क्षमता के मुकाबले 42,119 से अधिक कैदी बंद हैं। 50 फीसदी से अधिक विचाराधीन (अंडरट्रायल) कैदी हैं, और राज्य उप्र और बिहार के बाद देश में तीसरी सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाली जेल व्यवस्थाओं में से एक है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!मप्र की जेलों में क्षमता से 147 फीसदी अधिक कैदी बंद हैं। कुल कैदियों में से लगभग 50-52 फीसदी विचाराधीन हैं, जिनका दोष अभी सिद्ध नहीं हुआ है। विचाराधीन कैदियों में 21 फीसदी आदिवासी हैं, जो देश में सर्वाधिक है।
रीवा सेंट्रल जेल में सबसे अधिक भीड़
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, रीवा सेट्रल जेल में क्षमता से तीन गुना अधिक कैदी हैं। हालांकि, इसके पीछे बड़ी संख्या में अंडरट्रायल कैदियों का होना प्रमुख कारण है, जिनमें से कई 3-5 साल से बंद हैं।
ढांचागत सुधार
मप्र सरकार क्षमता बढ़ाने और कैदियों के दबाव को कम करने के लिए आधारभूत ढांचे में सुधार कर रही है। सरकार 11 नई जेलें बना रही है और मौजूदा जेलों में 120 नई बैरकें जोडऩे की प्रक्रिया चल रही है। वहीं सदाचरण के आधार पर अंबेडकर जयंती और अन्य मौकों पर कैदियों को रिहा किया जा रहा है।
देश में सबसे ज्यादा दोषी कैदी उप्र में
उप्र में देश के सर्वाधिक कैदी (करीब 1.17 लाख से अधिक) बंद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में जेल में प्रवेश की संख्या भी सबसे अधिक (2,62,640) रही है। उप्र में देश के सबसे ज्यादा दोषी कैदी हैं। राज्य महिला अपराधों में दोषियों को सजा दिलाने के मामले में लगातार पांचवें वर्ष शीर्ष पर है, जहां यह दर 76.6 फीसदी दर्ज की गई है। उप्र की कुछ जेलों में क्षमता से 3 से 4 गुना तक अधिक कैदी हैं।
उदाहरण के लिए, कानपुर जेल की क्षमता 114 है, जबकि वहां 442 बंदी हैं, और मिर्जापुर जिला जेल में 320 की क्षमता के मुकाबले 1,279 कैदी बंद हैं। उप्र की केंद्रीय जेलों की अधिभोग दर 74.3 फीसदी है, जो पंजाब और केरल जैसे राज्यों से काफी बेहतर है। वहीं, महिला जेलों में यह दर मात्र 36.7 फीसदी है।
उप्र में जेल में सर्वाधिक मौतें
जेलों में भीड़ के साथ-साथ स्टाफ की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। उप्र में जेल स्टाफ के 4,278 पद खाली हैं, जो देश में बिहार (4,593) के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। वर्ष 2024 के दौरान उप्र की जेलों में 304 प्राकृतिक और 26 अप्राकृतिक मौतें (जिनमें 16 आत्महत्याएं शामिल हैं) दर्ज की गई हैं, जो देश में सर्वाधिक हैं। हाल ही में राज्य सरकार ने जेलों में भीड़ कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर 10,000 से अधिक कैदियों (विचाराधीन और दोषी) को अंतरिम जमानत और पैरोल पर रिहा करने की प्रक्रिया भी अपनाई थी।
