सीहोर के रुठिया परिवार के करोड़ों के दावे पर यूके का जवाब
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को दिए गए कथित 35 हजार रुपये के वॉर लोन पर 109 साल बाद ब्रिटेन ने पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। सीहोर के रुठिया परिवार से यूके डेब्ट मैनेजमेंट ऑफिस ने अतिरिक्त दस्तावेज और ऐतिहासिक प्रमाण मांगे हैं।
भोपाल। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को दिए गए कथित 35 हजार रुपए के वॉर लोन का मामला एक बार फिर चर्चा में है। सीहोर के प्रतिष्ठित नगर सेठ रुठिया परिवार के ऐतिहासिक दावे पर ब्रिटेन के यूके डेब्ट मैनेजमेंट ऑफिस ने पहली औपचारिक प्रतिक्रिया भेजते हुए अतिरिक्त दस्तावेज और प्रमाण उपलब्ध कराने को कहा है। इस जवाब के बाद 109 वर्ष पुरानी फाइल फिर सक्रिय होती दिखाई दे रही है और अब पूरा मामला दस्तावेजी साक्ष्यों की कसौटी पर पहुंच गया है। रुठिया परिवार के सदस्य विनय रुठिया और विवेक रुठिया के अनुसार, तीन अगस्त को ब्रिटेन के संबंधित कार्यालय से ई-मेल प्राप्त हुआ। जवाब में स्पष्ट किया गया कि यदि दावेदार का किसी अप्राप्त भुगतान पर अधिकार बनता है, तो उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। अधिकारियों ने प्रमाण-पत्र, पत्राचार और अन्य ऐतिहासिक रिकॉर्ड की प्रतियां उपलब्ध कराने का भी आग्रह किया है।

1917 के दस्तावेजों से खुला ऐतिहासिक दावा
परिवार का कहना है कि पुराने अभिलेखों की जांच के दौरान वर्ष 1917 के ऐसे दस्तावेज मिले, जिनसे पता चलता है कि प्रथम विश्व युद्ध के समय उनके पूर्वजों ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपए वॉर लोन के रूप में उपलब्ध कराए थे। उस दौर में युद्ध संचालन, सैनिकों के राशन और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए आर्थिक संसाधन जुटाए जा रहे थे। परिवार का दावा है कि उसी अभियान के तहत यह राशि दी गई थी। दस्तावेज मिलने के बाद परिवार ने अधिवक्ता श्रेयांस रानीवाला के माध्यम से यूके लोन मैनेजमेंट ऑफिस को कानूनी नोटिस भेजा था। यह नोटिस ई-मेल और हार्ड कॉपी दोनों माध्यमों से भेजा गया। अब ब्रिटेन से मिले जवाब को परिवार अपने दावे की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति मान रहा है।
अब निर्णायक होंगे दस्तावेजी साक्ष्य
यूके कार्यालय ने जवाब में बताया है कि उपलब्ध दस्तावेज संबंधित रजिस्ट्रार को भेज दिए गए हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि परिवार के पास मूल प्रमाण-पत्र, पत्राचार या अन्य दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो उनकी प्रमाणित प्रतियां प्रस्तुत की जाएं। इन्हीं अभिलेखों के आधार पर आगे की वैधानिक प्रक्रिया तय होगी।
रुठिया परिवार ने शुरू की दस्तावेज जुटाने की कवायद
परिवार का कहना है कि सभी पुराने रिकॉर्ड, पत्राचार और उपलब्ध प्रमाण व्यवस्थित कर जल्द ही ब्रिटिश अधिकारियों को भेजे जाएंगे। उनका विश्वास है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों के परीक्षण के बाद दावे की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी और आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी। विवेक रुठिया के अनुसार, उनके दादा सेठ जुम्मालाल रुठिया का वर्ष 1937 में निधन हो गया था। परिवार का दावा है कि उनके निधन के बाद वसीयत और अन्य पुराने दस्तावेजों में ब्रिटिश शासन के साथ हुए पत्राचार तथा वॉर लोन से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित मिले, जिनके आधार पर यह पूरा दावा तैयार किया गया।
करोड़ों के दावे और कानूनी बहस पर टिकी नजर
रुठिया परिवार का कहना है कि उस समय के 35 हजार रुपए का वर्तमान मूल्य करोड़ों रुपए के बराबर हो सकता है। परिवार का यह भी दावा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के अनुसार किसी संप्रभु राष्ट्र पर वैध ऋण संबंधी दायित्व लागू हो सकते हैं। हालांकि, इस दावे की वैधानिक स्थिति और भुगतान संबंधी कोई अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है। फिलहाल ब्रिटेन की ओर से अतिरिक्त साक्ष्य मांगना इस ऐतिहासिक मामले में सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक कदम माना जा रहा है।
