नई दिल्ली। मोबाइल फोन, टैबलेट, टीवी और दूसरे डिजिटल स्क्रीन आज बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहते हैं। इसी बीच सामने आई एक नई दीर्घकालिक रिसर्च ने कम उम्र में ज्यादा स्क्रीन देखने और बाद में वर्किंग मेमोरी तथा पढ़ाई के प्रदर्शन के बीच संबंध को लेकर चिंता बढ़ाई है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!कम उम्र में स्क्रीन इस्तेमाल पर खास ध्यान
24 अगस्त 2026 को सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने पाया कि लगभग 1 साल की उम्र और स्कूल शुरू होने के आसपास यानी 6 साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर बाद के वर्षों में कमजोर अकादमिक प्रदर्शन और कमजोर वर्किंग मेमोरी से जुड़ा था। अध्ययन में बच्चों के शुरुआती वर्षों के स्क्रीन इस्तेमाल और बाद की सीखने की क्षमता के बीच संबंध को देखा गया।
शोध में खास तौर पर यह संकेत मिला कि स्क्रीन एक्सपोजर का समय और उम्र, दोनों महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यानी केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि बच्चा दिन में कितने घंटे स्क्रीन देखता है, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि वह किस उम्र में और किस तरह की सामग्री देख रहा है।
वर्किंग मेमोरी क्या होती है?
वर्किंग मेमोरी वह मानसिक क्षमता है जिसकी मदद से बच्चा किसी जानकारी को थोड़े समय तक दिमाग में रखकर उसका इस्तेमाल करता है। उदाहरण के लिए, शिक्षक द्वारा बताए गए निर्देशों को याद रखना, गणित का सवाल हल करते समय बीच के चरणों को याद रखना या पढ़े गए वाक्य का अर्थ समझना—इन सभी कामों में वर्किंग मेमोरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी कारण बचपन में ध्यान, सीखने और याद रखने की क्षमता का विकास काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्या हर तरह का स्क्रीन टाइम नुकसानदायक है?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। रिसर्च यह साबित नहीं करती कि हर तरह का स्क्रीन इस्तेमाल बच्चों की मेमोरी को कमजोर करता है। स्क्रीन टाइम और बच्चों की कॉग्निटिव क्षमता पर हुए अध्ययनों के नतीजे एक जैसे नहीं हैं।
उदाहरण के लिए, अगस्त 2026 में प्रकाशित एक अलग फिनिश अध्ययन में बचपन से किशोरावस्था तक अधिक स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में बेहतर कॉग्निटिव प्रोसेसिंग देखी गई। शोधकर्ताओं ने भी इस बात पर जोर दिया कि स्क्रीन को पूरी तरह नुकसानदायक मानने के बजाय यह देखना जरूरी है कि बच्चे स्क्रीन का इस्तेमाल किस उद्देश्य और किस प्रकार कर रहे हैं।
इसलिए एजुकेशनल कंटेंट, रचनात्मक गतिविधियां और माता-पिता की भागीदारी वाले स्क्रीन इस्तेमाल और लगातार मनोरंजन के लिए निष्क्रिय स्क्रीन देखने को एक जैसा नहीं माना जा सकता। मौजूदा शोध भी बताता है कि स्क्रीन टाइम का प्रभाव उम्र, कंटेंट, अवधि और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करता है।
छोटे बच्चों के लिए ज्यादा सावधानी जरूरी
बचपन के शुरुआती वर्षों में दिमाग तेजी से विकसित होता है। इस दौरान बच्चों को बातचीत, खेल, किताब पढ़ने, शारीरिक गतिविधि और आमने-सामने सामाजिक संपर्क जैसी गतिविधियों की जरूरत होती है। अत्यधिक स्क्रीन इस्तेमाल इन गतिविधियों के लिए उपलब्ध समय को कम कर सकता है।
विशेषज्ञ स्रोतों में यह भी बताया गया है कि छोटे बच्चों में स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल ध्यान, भाषा सीखने, याददाश्त और अन्य कॉग्निटिव क्षमताओं से जुड़ी समस्याओं के साथ पाया गया है। हालांकि, स्क्रीन के प्रभाव को समझने के लिए उम्र और कंटेंट सहित पूरे संदर्भ को देखना जरूरी है।
माता-पिता क्या करें?
बच्चों से स्क्रीन पूरी तरह छीनना हमेशा व्यावहारिक समाधान नहीं है। इसके बजाय माता-पिता को स्क्रीन इस्तेमाल को व्यवस्थित करने पर ध्यान देना चाहिए।
उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम तय करें।
खाने और सोने के समय स्क्रीन से दूरी रखें।
छोटे बच्चों के साथ स्क्रीन देखते समय माता-पिता भी मौजूद रहें।
मनोरंजन के बजाय पढ़ाई और रचनात्मक गतिविधियों को प्राथमिकता दें।
रोजाना आउटडोर खेल और शारीरिक गतिविधि के लिए समय निकालें।
बच्चे के साथ बातचीत, कहानी पढ़ने और आमने-सामने खेलने का समय बढ़ाएं।
स्क्रीन के ज्यादा उपयोग से दुनिया में प्रभावित आबादी
वैश्विक स्तर पर अत्यधिक स्क्रीन उपयोग (Excessive Screen Time) से बड़ी आबादी प्रभावित है। दुनिया भर में लोग औसतन प्रतिदिन 6 घंटे 51 मिनट स्क्रीन पर बिता रहे हैं, जिससे विभिन्न आयु वर्ग अलग-अलग प्रकार से प्रभावित हो रहे हैं।
आयु-वार प्रभावित आबादी और औसत स्क्रीन टाइम
आयु वर्ग (Age Group) औसत दैनिक स्क्रीन समय प्रमुख प्रभाव और आंकड़े
0 से 2 वर्ष (शिशु) : 2 घंटे : 98% शिशु किसी न किसी रूप में स्क्रीन देखते हैं। इससे भाषा सीखने में देरी (Speech Delay) और आंखों का तिरछापन बढ़ रहा है।
3 से 12 वर्ष (बच्चे): 5.5 घंटे : 87% बच्चे तय मानकों से अधिक स्क्रीन देखते हैं। इसके कारण 66% बच्चों की शारीरिक फिटनेस कमजोर हुई है और मोटापा बढ़ रहा है।
13 से 18 वर्ष (किशोर): 7.5 से 8.5 घंटे : 41% किशोर प्रतिदिन 8 घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। लगभग 25% किशोरों में इसके कारण चिंता (Anxiety) और डिप्रेशन के लक्षण देखे गए हैं।
18 से 29 वर्ष (युवा) : 9+ घंटे : जेन जेड (Gen Z) सबसे ज्यादा प्रभावित है। इस आयु वर्ग के 45% युवाओं का मानना है कि उनका अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) कमजोर हुआ है।
30 से 50 वर्ष (वयस्क): 5 से 7 घंटे : इस आबादी का स्क्रीन टाइम वर्क-फ्रॉम-होम और सोशल मीडिया के कारण 23% तक बढ़ा है। 75% कामकाजी लोग डिजिटल आई स्ट्रेन (आंखों की थकान) से पीड़ित हैं।
60 वर्ष से अधिक (बुजुर्ग): 3 से 5 घंटे : यह वर्ग सबसे कम प्रभावित है, लेकिन अकेलेपन के कारण बुजुर्गों में भी रील्स और वीडियो देखने की लत (डिजिटल ओबेसिटी) तेजी से बढ़ रही है।
अत्यधिक स्क्रीन उपयोग के मुख्य वैश्विक प्रभाव
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर: लगातार स्क्रीन देखने से शरीर में ‘मेलाटोनिन’ (नींद का हार्मोन) कम बनता है, जिससे अनिद्रा और मानसिक तनाव बढ़ता है।
डिजिटल बुढ़ापा (Digital Dementia): डॉक्टरों के अनुसार, रात में देर तक फोन चलाने से मस्तिष्क में सूजन आती है, जिससे याददाश्त और निर्णय लेने की क्षमता समय से पहले कमजोर होने लगती है।
सामाजिक व्यवहार में बदलाव: वास्तविक दुनिया में लोगों से मिलना-जुलना कम हो रहा है, जिससे युवाओं में अकेलापन और व्यवहारिक चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है।
