-सुप्रीम कोर्ट के 2024 के राजेन्द्र कुमार बड़जात्या फैसले का पालन सुनिश्चित कराने की दिशा में हाईकोर्ट का सख्त रुख
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!भोपाल। भोपाल के आवासीय क्षेत्रों में आवासीय भूखण्डों पर नियमों के विपरीत संचालित हो रही व्यावसायिक गतिविधियों के मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में हुई सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने संबंधित पक्ष को निर्देशित किया कि यदि उसके पास आवासीय भूखण्ड पर मॉल, होटल अथवा अन्य व्यावसायिक गतिविधि संचालित करने की वैधानिक अनुमति है, तो वह 7 दिवस के भीतर उसके समस्त दस्तावेज भोपाल नगर निगम के समक्ष प्रस्तुत करे।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संबंधित पक्ष निर्धारित अवधि में वैधानिक अनुमति प्रस्तुत नहीं करता है, तो भोपाल नगर निगम सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2024 के राजेन्द्र कुमार बड़जात्या प्रकरण में दिए गए आदेशों के अनुपालन में नियमानुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है। इस आदेश के बाद अब उन लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जो आवासीय भूखण्डों पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित कर रहे हैं और वर्षों से नियमों एवं आपत्तियों को नजरअंदाज करते आ रहे हैं।
विवेक त्रिपाठी ने कहा—अब अनुमति के नाम पर बहाने नहीं चलेंगे
याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी ने कहा कि, “यह आदेश भोपाल के आवासीय क्षेत्रों को बचाने की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम है। वर्षों से आवासीय भूखण्डों पर मॉल, होटल और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं और जिम्मेदार अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद किए बैठे हैं। अब न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि वैधानिक अनुमति है तो उसे सामने रखिए, अन्यथा कानून के अनुसार कार्रवाई का रास्ता खुला है।” उन्होंने कहा कि “अब भोपाल नगर निगम की असली परीक्षा है। निगम को यह साबित करना होगा कि वह आम रहवासियों के लिए भी कानून लागू करता है या फिर प्रभावशाली लोगों के अवैध व्यावसायिक हितों की रक्षा करता रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद किसी भी अधिकारी के पास कार्रवाई से बचने का बहाना नहीं होना चाहिए।”
लवनीश भाटी बोले—रहवासी वर्षों से झेल रहे हैं परेशानी
रहवासी लवनीश भाटी ने कहा कि, “आवासीय क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियों का सीधा असर वहां रहने वाले परिवारों पर पड़ता है। ट्रैफिक, पार्किंग, शोर, सुरक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं पर दबाव जैसी समस्याएं रहवासी वर्षों से झेल रहे हैं। इसके बावजूद शिकायत करने वाले नागरिकों की सुनवाई नहीं होती।” उन्होंने कहा कि “अब न्यायालय ने 7 दिन की समयसीमा में वैधानिक अनुमति प्रस्तुत करने की बात स्पष्ट कर दी है। यदि अनुमति है तो सामने लाई जाए और यदि नहीं है तो सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार कार्रवाई हो। रहवासियों को अब केवल आश्वासन नहीं, जमीन पर कार्रवाई चाहिए।”
संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति की चेतावनी
संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति ने कहा कि आवासीय भूखण्डों को व्यावसायिक उपयोग में बदलकर नियमों की अनदेखी करने की प्रवृत्ति को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। समिति ने भोपाल नगर निगम से मांग की है कि न्यायालय के निर्देश के अनुरूप संबंधित पक्षों से दस्तावेज प्राप्त कर उनकी वैधानिकता की जांच की जाए और जहां आवश्यक वैधानिक अनुमति उपलब्ध न हो, वहां सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों एवं लागू नियमों के अनुसार तत्काल कार्रवाई की जाए। समिति ने कहा कि अब मामला केवल किसी एक भवन या प्रतिष्ठान का नहीं है, बल्कि पूरे भोपाल को बचाने का है साथ ही नागरिक अधिकारों और न्यायालय के आदेशों के सम्मान का है।
हम माननीय न्यायालय के आदेश का स्वागत करते है।
