केंद्रीय मंत्री शिवराज की नाराजगी के बाद मुख्य सचिव से मांगी रिपोर्ट
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!भोपाल। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के बुधनी क्षेत्र के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने का मामला अब प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नाराजगी के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मामले में रिपोर्ट तलब की है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी और सच्चाई सामने लाई जाएगी।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि उनकी सरकार संवेदनशील है। जब वरिष्ठ नेता ने कोई विषय उठाया है, तो उसकी जांच कराना जरूरी है। उन्होंने मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगे जाने की जानकारी देते हुए कहा कि जांच के बाद “दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा।”
क्या है पूरा मामला?
यह मामला सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा क्षेत्र के कोसमी गांव में वन भूमि से कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से जुड़ा है। 11 अक्टूबर 2026 को वन विभाग और राज्य वन विकास निगम की कार्रवाई में बरेला आदिवासी समुदाय के परिवारों के मकान हटाए गए। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में लगभग 12 परिवारों के घरों या अस्थायी झोपड़ियों पर कार्रवाई का उल्लेख किया गया है।
प्रभावित परिवारों का आरोप है कि उनके घरों के साथ खेती और फसलों को भी नुकसान पहुंचा। इस कार्रवाई के बाद उनके सामने रहने और आजीविका का संकट खड़ा हो गया।
शिवराज सिंह चौहान ने जताई नाराजगी
मामले की जानकारी मिलने के बाद शिवराज सिंह चौहान कोसमी गांव पहुंचे। उन्होंने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और उनकी समस्याएं सुनीं। उन्होंने कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई तथा मुख्य सचिव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से भी बात की।
शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि गरीब आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। उन्होंने मामले को मुख्यमंत्री के सामने उठाने और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग करने की बात कही। उन्होंने प्रभावित परिवारों को राहत देने तथा उनके रहने की व्यवस्था सुनिश्चित करने का भी भरोसा दिया।
वन विकास निगम ने क्या सफाई दी?
राज्य वन विकास निगम की ओर से बताया गया कि संबंधित भूमि आरक्षित वन क्षेत्र का हिस्सा है और वर्ष 2021 में पौधरोपण के लिए निगम को सौंपी गई थी। निगम के अनुसार, बाद में कुछ लोगों ने क्षेत्र में अतिक्रमण किया और पौधरोपण को नुकसान पहुंचाया।
विभाग का दावा है कि इस संबंध में वन अपराध के मामले दर्ज किए गए और प्रभावित लोगों को बेदखली के नोटिस भी दिए गए थे। निगम के मुताबिक, कार्रवाई नियमानुसार की गई।
हालांकि, प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे लंबे समय से वहां रह रहे हैं। कुछ परिवारों ने वर्ष 1986 और 1995 की पट्टे की रसीदें होने का दावा भी किया है। इन दावों और भूमि के स्वामित्व या अधिकार से जुड़े दस्तावेजों की पुष्टि आधिकारिक जांच के बाद ही हो सकेगी।
अब मुख्यमंत्री की रिपोर्ट पर टिकी नजरें
मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगे जाने के बाद अब प्रशासनिक जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि कार्रवाई के दौरान सभी निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन हुआ या नहीं, प्रभावित परिवारों के दस्तावेजों की स्थिति क्या है और किसी अधिकारी की भूमिका में लापरवाही सामने आती है या नहीं।
फिलहाल मुख्यमंत्री के बयान के बाद मामले में निष्पक्ष जांच और तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है। जांच रिपोर्ट आने तक किसी भी पक्ष के आरोपों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
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