–जीतू पटवारी ने मोहन यादव और शिवराज सिंह पर साधा निशाना
उमंग सिंघार बोले- ओबीसी समाज की पीठ में छुरा घोंपा
मंत्री लोधी बोले—कांग्रेस का अध्यादेश त्रुटिपूर्ण
भोपाल। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे पर सियासत तेज हो गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े कानून को निरस्त किए जाने के बाद कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर हमला बोला है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि सरकार ने ओबीसी आरक्षण को रोकने के लिए कानूनी लड़ाई में करीब 200 करोड़ रुपये खर्च किए। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा-आरएसएस पर भी निशाना साधा।
वहीं, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि सरकार ने अदालत में आरक्षण के समर्थन में पर्याप्त तथ्य और मजबूत आंकड़े पेश नहीं किए। दूसरी ओर, राज्य मंत्री धर्मेंद्र लोधी ने तत्कालीन कमलनाथ सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने वाले अध्यादेश को त्रुटिपूर्ण बताया। इस विवाद के बीच कांग्रेस ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने और कानूनी लड़ाई का खर्च उठाने की घोषणा की है।
पटवारी बोले- एक पेशी के लिए दिए 55 लाख रुपये
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने शनिवार को भोपाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि ओबीसी आरक्षण के मामले में वकीलों को एक पेशी के लिए 55 लाख रुपये तक दिए गए। पटवारी के मुताबिक, सुनवाई की तारीख आगे बढ़ने पर भी सरकार की ओर से बड़ी रकम खर्च की जाती रही।
पटवारी ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार की मंशा ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के पक्ष में प्रभावी पैरवी करने की नहीं थी। उन्होंने कहा कि सरकार ने अदालत में ऐसे तथ्य प्रस्तुत किए, जिनके आधार पर 27 प्रतिशत आरक्षण का पक्ष मजबूती से नहीं रखा जा सका।
कांग्रेस अध्यक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को साजिश बताते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा-आरएसएस की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने इन नेताओं को राजनीतिक रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए तीखी टिप्पणी भी की।
सुप्रीम कोर्ट जाएगी कांग्रेस, कानूनी लड़ाई का खर्च उठाएगी पार्टी
जीतू पटवारी ने कहा कि कांग्रेस ओबीसी समाज के अधिकारों की लड़ाई जारी रखेगी। पार्टी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी और इस कानूनी लड़ाई का पूरा खर्च उठाएगी। पटवारी ने कहा कि 27 प्रतिशत आरक्षण का फैसला तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने लिया था। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा सरकार ने इस व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू कराने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। उन्होंने कहा कि ओबीसी युवाओं को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर युवाओं के बीच जाएगी और सरकार से जवाब मांगेगी।
कमलनाथ सरकार ने 2019 में बढ़ाया था आरक्षण
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर कानूनी विवाद वर्ष 2019 में शुरू हुआ था। तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया था। इसके बाद इस व्यवस्था को कानूनी चुनौती दी गई।
आरक्षण बढ़ने से प्रदेश में कुल आरक्षण का अनुपात 73 प्रतिशत तक पहुंच गया था। मामला कई वर्षों तक अदालत में लंबित रहा। इस दौरान सरकारी भर्तियों में 87:13 प्रतिशत का फार्मूला अपनाया गया, जिसके तहत 87 प्रतिशत पदों पर भर्ती की प्रक्रिया आगे बढ़ती थी, जबकि 13 प्रतिशत पदों को विवाद के अंतिम निर्णय तक रोककर रखा गया था।
9 अक्टूबर 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े संशोधन कानून को असंवैधानिक मानते हुए निरस्त कर दिया। अदालत के फैसले के बाद प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत रहने की स्थिति बनी है। कोर्ट ने रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के पात्र अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने के निर्देश भी दिए हैं।
ओबीसी सर्वे के आंकड़ों पर पटवारी ने उठाए सवाल
जीतू पटवारी ने राज्य सरकार की ओर से अदालत में पेश किए गए ओबीसी सर्वे के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश की आबादी करीब 7.25 करोड़ होने के बावजूद सर्वे के नाम पर लगभग 10 हजार लोगों से संबंधित आंकड़े प्रस्तुत किए गए।
पटवारी के मुताबिक, आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक और विश्वसनीय आंकड़े पेश किए जाने चाहिए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने अदालत में ओबीसी आरक्षण के पक्ष को मजबूती से रखने के लिए जरूरी प्रयास नहीं किए।
कांग्रेस ने इस मामले में सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग की है। हालांकि, सर्वे में शामिल लोगों की वास्तविक संख्या, उसकी पद्धति और अदालत में प्रस्तुत आंकड़ों की प्रकृति की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों से की जानी चाहिए।
सिंघार बोले- ओबीसी समाज की पीठ में छुरा घोंपा
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी हाईकोर्ट के फैसले के बाद भाजपा सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि ओबीसी समाज को उम्मीद थी कि 27 प्रतिशत आरक्षण मिलने से शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, लेकिन अदालत के फैसले से इन उम्मीदों को झटका लगा है। सिंघार ने दावा किया कि मध्य प्रदेश की आबादी में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक है। उन्होंने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह अदालत में पर्याप्त आंकड़े, तथ्य और कानूनी आधार प्रस्तुत करती।
नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार ने 27 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में प्रभावी पैरवी नहीं की। उन्होंने सरकार की भूमिका को ओबीसी समाज के साथ विश्वासघात बताते हुए कहा कि समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि आरक्षण के मुद्दे पर सरकार की भूमिका की समीक्षा होनी चाहिए और पिछड़े वर्ग के युवाओं के हितों की रक्षा के लिए कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
मंत्री धर्मेंद्र लोधी ने कांग्रेस पर किया पलटवार
कांग्रेस के आरोपों पर राज्य मंत्री धर्मेंद्र लोधी ने तत्कालीन कमलनाथ सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश के जरिए ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला किया था, लेकिन इसकी अधिसूचना में खामियां थीं।
लोधी के मुताबिक, अध्यादेश जल्दबाजी में लाया गया और इस महत्वपूर्ण विषय पर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से भी परामर्श नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार हाईकोर्ट के फैसले का विधिक परीक्षण करेगी और आगे की कार्रवाई कानूनी पहलुओं के आधार पर तय की जाएगी।
इस तरह, कांग्रेस जहां आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है, वहीं भाजपा सरकार की ओर से तत्कालीन कांग्रेस सरकार की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
फैसले से सरकारी भर्ती के अभ्यर्थियों पर क्या असर पड़ेगा?
हाईकोर्ट के फैसले का असर ओबीसी आरक्षण से जुड़ी सरकारी भर्तियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण व्यवस्था पर पड़ सकता है। अदालत ने विवादित 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के पात्र अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रक्रिया तीन महीने में पूरी करने के निर्देश दिए हैं।
इससे लंबे समय से नियुक्तियों का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। दूसरी ओर, 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे ओबीसी पक्ष के लिए अब सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौती महत्वपूर्ण होगी।
कांग्रेस ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की है। ऐसे में आगे की स्थिति शीर्ष अदालत में होने वाली सुनवाई और संबंधित कानूनी आदेशों पर निर्भर करेगी।
अब आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के आसार
मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस ने सरकार पर आरक्षण के मामले में कमजोर पैरवी करने का आरोप लगाया है, जबकि भाजपा सरकार ने कांग्रेस के समय लागू की गई व्यवस्था की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
अब निगाहें कांग्रेस की प्रस्तावित कानूनी कार्रवाई, राज्य सरकार के विधिक परीक्षण और सुप्रीम कोर्ट में होने वाली संभावित सुनवाई पर रहेंगी। इस मामले का अगला चरण प्रदेश में आरक्षण की व्यवस्था और लंबे समय से लंबित नियुक्तियों के भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
