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UCC मसौदे को मंजूरी, निकाह हलाला होगा दंडनीय अपराध

aaptak.news28@gmail.com July 19, 2026
ucc in mp

भोपाल। मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में जगदीशपुर में कैबिनेट बैठक हुई। भोपाल से मुख्यमंत्री समेत पूरी कैबिनेट और अधिकारी ई-बस से जगदीशपुर पहुंचे। सीएम मोहन यादव ने कैबिनेट के निर्णयों की जानकारी देते हुए बताया कि सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए रिटायर्ड न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई समिति के मसौदे को मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कानून किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से इस कानून का समर्थन करने की अपील भी की।

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मुख्यमंत्री ने बताया कि 27 अप्रैल 2026 को गठित सात सदस्यीय समिति ने विभिन्न राज्यों के यूसीसी मॉडल, प्रचलित कानूनों और सामाजिक पहलुओं का अध्ययन किया। सुझाव लेने के लिए वेब पोर्टल बनाया गया, जिसे 22 मई 2026 को सार्वजनिक किया गया। इसके अलावा प्रदेशभर में जिला और राज्य स्तर पर 50 से अधिक जन-परामर्श बैठकें आयोजित की गईं। सरकार के अनुसार पोर्टल पर 9,58,675 सुझाव प्राप्त हुए, जबकि बैठकों के माध्यम से भी 1,134 से अधिक सुझाव मिले। करीब 3.5 करोड़ एसएमएस भेजकर लोगों से राय ली गई।

सरकार का दावा है कि प्राप्त सुझावों में 93.54 प्रतिशत लोगों ने मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने का समर्थन किया। वहीं 92.20 प्रतिशत लोगों ने सभी समुदायों में महिलाओं और पुरुषों के लिए समान कानून की वकालत की। 91.32 प्रतिशत लोगों ने भेदभावपूर्ण तलाक संबंधी प्रावधान समाप्त करने का समर्थन किया, जबकि 92.66 प्रतिशत लोगों ने महिलाओं और पुरुषों को संपत्ति में समान अधिकार दिए जाने की बात कही।

बहुविवाह पर रोक, हर विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य
समान नागरिक संहिता में सभी समुदायों में केवल एक ही शादी (मोनोगैमी) को अनिवार्य बनाता है। कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है। विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है। अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच विवाह पर रोक लगाई गई है। मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया है। अब विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है।

निकाह हलाला जैसी शर्तों को बढ़ावा देना अपराध
मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने शादी के समय किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है। साथ ही संहिता में लोगों के लिए शादी और तलाक दोनों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है।

शहरी क्षेत्रों में मप्र ई-नगर पालिका पोर्टल और ग्रामीण क्षेत्रों में एसडीएम, नगरपालिका या पंचायत के जरिए यह प्रक्रिया पूरी होगी। रजिस्ट्रेशन न होने से शादी अमान्य नहीं होगी, लेकिन रजिस्ट्रार द्वारा बिना ठोस लिखित कारण के आवेदन खारिज करने पर जुर्माने का प्रावधान है। तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए ‘निकाह हलालाÓ जैसी अपमानजनक या नीचा दिखाने वाली शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना एक दंडनीय आपराधिक अपराध माना जाएगा।

अवैध शब्द को पूरी तरह हटाया
बच्चों के अधिकार और कस्टडी को लेकर संहिता में ‘अवैध संतानÓ की अवधारणा समाप्त कर दी गई है। विवाह, लिव-इन, गोद लेने, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) से जन्मे सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा मिलेगा। अभिरक्षा के मामलों में अदालत बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देगी।

उत्तराधिकार में समान अधिकार
बेटे और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो। मृतक की संपत्ति में विधवाओं और विधुरों के साथ भी समान व्यवहार होगा। जीवित माता और पिता दोनों को क्लास-1 का उत्तराधिकारी माना गया है, और वे मृतक बच्चे की संपत्ति में जीवनसाथी और बच्चों के साथ बराबर का हिस्सा पाएंगे। कोई भी वयस्क अपनी स्वयं अर्जित या पैतृक संपत्ति की 100 प्रतिशत वसीयत अपनी इच्छा से कर सकेगा। हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी व्यक्ति उत्तराधिकार का अधिकार खो देगा और यदि कोई कानूनी वारिस नहीं होगा तो संपत्ति राज्य के पास चली जाएगी।

एक माह के अंदर करना होगा रजिस्ट्रेशन
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास लिव-इन रिलेशनशिप का बयान जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। पार्टनर्स की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। वे प्रतिबंधित श्रेणी में न हों, पहले से विवाहित न हों और उनकी सहमति स्वतंत्र होनी चाहिए।

यदि कोई पार्टनर 21 साल से कम उम्र का है, तो लिव-इन के शुरू होने और खत्म होने की जानकारी उनके माता-पिता/अभिभावकों को भेजी जाएगी। रजिस्ट्रार यह रिकॉर्ड स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी भेजेगा। लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उन्हें पूर्ण उत्तराधिकार मिलेगा। यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकती है।

तीन से छह माह की जेल का प्रावधान
बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से ज्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 जुर्माना हो सकता है। गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 जुर्माना तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 का जुर्माना हो सकता है। मप्र का यह प्रस्तावित यूसीसी आधुनिक सामाजिक आवश्यकताओं, जेंडर इक्वलिटी और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने वाला एक प्रगतिशील विधिक ढांचा है। यह समाज के सभी वर्गों (अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर) में लैंगिक समानता लाने और कमजोर वर्गों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

अनुसूचित जनजाति पर यूसीसी लागू नहीं होगा
संवैधानिक सुरक्षा-कवच का सम्मान करते हुए यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (खंड 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों (जैसे भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया) पर लागू नहीं होगा। इसके अलावा, जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा संविधान के भाग 11 के तहत की गई है, उन्हें भी इस कोड से विशेष रूप से बाहर रखा गया है। संहिता का परिभाषा वाला हिस्सा इसके अधिकार क्षेत्र को तय करता है। उत्तराधिकार से जुड़े जिन शब्दों की परिभाषा इसमें नहीं है, उनके लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 के अर्थ मान्य होंगे।

डॉ. मोहन यादव ने कहा कि यूसीसी का उद्देश्य समाज में विभाजन नहीं, बल्कि विश्वास, समानता, महिला सम्मान और सामाजिक समरसता को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि यह संविधान की मूल भावना के अनुरूप सभी नागरिकों के लिए समान न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने वाला कानून है। सरकार को उम्मीद है कि सभी दल और समाज के सभी वर्ग इस पहल का समर्थन करेंगे। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों, संरक्षित रूढिग़त समुदायों तथा घुमंतू एवं अर्धघुमंतू जनजातियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा गया है। धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पद्धतियों और रीति-रिवाजों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होगा। सभी धर्मों को अपने धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता पूर्ववत मिलेगी।

अब तक दो राज्यों में यूसीसी बिल पारित
उत्तराखंड यूीसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बन गया। इसके बाद गुजरात यूीसीसी बिल पास करने वाला देश का दूसरा राज्य बना है। असम विधानसभा में यूसीसी बिल 27 मई को पेश किया गया था। यह बिल सदन से पारित भी हो गया। गोवा में पहले से ही यूसीसी लागू है, लेकिन वहां इसे पुर्तगाली सिविल कोड के तहत लागू किया गया था। उत्तराखंड आजादी के बाद समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य है।

UCC से कांग्रेस सहित 4 पार्टियों का किनारा

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