-81 मानसिक स्वास्थ्य संस्थान बिना रजिस्ट्रेशन के संचालित
भोपाल। प्रदेश में सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली खस्ताहाल बुनियादी ढांचे और भारी कमियों के सहारे टिकी हुई है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा ऑल-इंडिया परफॉरमेंस ऑडिट रिपोर्ट ने राज्य की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश की 13.9 प्रतिशत आबादी मानसिक बीमारियों से पीडि़त है, जो राष्ट्रीय औसत (10.7 प्रतिशत) से काफी अधिक है। इसके बावजूद मरीजों को न तो समय पर दवाएं मिल रही हैं और न ही इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं।
प्राधिकरण और बजट में लापरवाही
मेंटल हेल्थकेयर एक्ट-2017 के तहत गठित राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण खुद संसाधनों और अधिकारियों की कमी से जूझ रहा है। अधिनियम लागू होने के 2 साल 7 महीने की देरी से सितंबर 2020 में इसका गठन तो हुआ, लेकिन जुलाई 2025 तक यह आंशिक रूप से ही काम कर सका। स्वीकृत 15 सदस्यों में से 4 साल बाद भी केवल 4 की ही नियुक्ति हो सकी। 2020-24 के दौरान सरकार ने एसएमएचए फंड के लिए 2.40 करोड़ जारी किए, लेकिन पहले दो वर्षों में एक भी पैसा खर्च नहीं हुआ। वहीं 2022-24 के दौरान जारी बजट का 46 से 89 प्रतिशत हिस्सा बिना इस्तेमाल के वापस लौट गया। इसके अलावा राज्य में न तो मेंटल हेल्थ रिव्यू बोर्ड का गठन किया गया और न ही न्यूनतम मानकों के नियम बनाए गए।
रिपोर्ट की प्रमुख और चिंताजनक बातें
3 साल तक गायब रहीं जरूरी दवाएं: वर्ष 2021 से 2024 के दौरान जांचे गए सरकारी मानसिक अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यक मनोरोग दवाएं 1 महीने से लेकर 36 महीने (3 साल) तक अनुपलब्ध रहीं।
विशेषज्ञों का अकाल: प्रदेश में प्रति लाख आबादी पर महज 0.05 मनोचिकित्सक हैं। संस्थानों में जनशक्ति की कमी 13 से 67 प्रतिशत तक पाई गई।
रेडियोलॉजिस्ट के बिना चल रहे अस्पताल: इंदौर और ग्वालियर के दोनों प्रमुख सरकारी मानसिक अस्पतालों में 2021 से 2024 के बीच एक भी रेडियोलॉजिस्ट तैनात नहीं था। मजबूरी में मनोचिकित्सकों को खुद ही एक्स-रे और डायग्नोस्टिक इमेज देखकर निर्णय लेना पड़ा।
उपकरणों का 100 प्रतिशत तक अभाव: मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के मानदंडों के अनुसार, 5 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जरूरी उपकरणों की कमी 47 से 100 प्रतिशत तक पाई गई।
बिना रजिस्ट्रेशन चल रहे 81 संस्थान: राज्य के कुल 163 मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में से केवल 82 के पास ही प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन है, जबकि 81 संस्थान बिना किसी वैध पंजीकरण के धडल्ले से चल रहे हैं।
बुनियादी सुविधाओं और भोजन का बुरा हाल
शौचालय व पेयजल: पर्याप्त शौचालय, स्वच्छता, पुरुषों-महिलाओं के लिए अलग वार्ड/टॉयलेट, साफ पेयजल और पर्याप्त बेड तक की व्यवस्था नहीं थी।
नाबालिगों के लिए जगह नहीं: किसी भी निरीक्षण किए गए संस्थान में नाबालिगों के लिए अलग रहने की व्यवस्था नहीं पाई गई।
भोजन का बजट बेहद कम: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों के बावजूद इंदौर और ग्वालियर के सरकारी मानसिक अस्पतालों में प्रति मरीज रोजाना भोजन पर क्रमश: 48 और 65.43 रुपए ही खर्च किए गए, जो तय मानकों से काफी कम है।
409 मरीज लापता/भागे : रिपोर्ट में पाया गया कि 4 प्रमुख संस्थानों से 409 मरीज या तो अस्पताल छोड़कर भाग गए या बिना चिकित्सकीय सलाह के चले गए। ऐसे मरीजों को ट्रैक करने या उनका इलाज जारी रखने के लिए अस्पतालों के पास कोई व्यवस्था नहीं थी।
