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रिपोर्ट : लोकसभा में सिर्फ 19 %, राज्यसभा में 39.17% हो सका कामकाज

aaptak.co.in1@gmail.com August 13, 2026
parliament report card

नई दिल्ली। संसद का मॉनसून सत्र पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया। इसके चलते कई सवाल उठे हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि क्या यही संसदीय लोकतंत्र है, जहां संसद का पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ जाए? सवाल उठता है कि विपक्ष का काम सरकार को घेरना है या सदन को ही ठप कर देना? 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हो गया, लेकिन सवाल यह है कि इस पूरे सत्र में बहस कितनी हुई और हंगामा कितना?

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दरअसल, आंकड़ों को देखें तो राज्यसभा की उत्पादकता महज 39.17 प्रतिशत रही और सभापति के अनुसार सदन में कुल 37 घंटे 49 मिनट ही काम हो सका। वहीं लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत रही। क्या यह प्रतिशत किसी परीक्षा के लिहाज से सामान्य पास प्रतिशत भी माना जाएगा? जो जेन जी युवा सड़कों पर उतरकर अपने सवाल और अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे थे, क्या वे यह नहीं देख रहे होंगे कि देश की संसद में कामकाज का स्तर आखिर कैसा है? सवाल उठ रहा है कि सांसदों को जनता ने संसद में बहस, सवाल और जवाब के लिए भेजा था या वेल में नारे लगाने के लिए?

अगर सरकार छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के लिए तैयार थी, तो विपक्ष ने सदन को चलने क्यों नहीं दिया? क्या राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी, छात्रों पर कार्रवाई और प्रधानमंत्री से माफी की मांग को एक साथ जोड़कर सदन को अनिश्चितकाल तक बाधित करना ही लोकतांत्रिक संघर्ष का तरीका है? क्या विपक्ष सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर करना चाहता था या सरकार को जवाब देने का मौका ही नहीं देना चाहता था? क्या जनता यह नहीं जानना चाहती थी कि छात्रों पर कार्रवाई क्यों हुई? क्या राम मंदिर से जुड़े आरोपों पर सरकार से जवाब नहीं मांगा जाना चाहिए था? क्या प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से सवाल पूछने का अधिकार विपक्ष का नहीं है? लेकिन क्या विपक्ष ने हंगामा करके खुद ही वह मंच नहीं गंवा दिया, जहां उसके सवाल देश के सामने दर्ज हो सकते थे? अगर सरकार जवाब देने को तैयार थी, तो फिर विपक्ष ने सरकार को वॉकओवर क्यों दिया?

क्या संसद में बैठे हर सांसद के क्षेत्र की अपनी समस्याएं नहीं हैं? क्या बेरोजगारी, सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और स्थानीय विकास से जुड़े सवाल पूछने का अधिकार सांसदों को नहीं है? जब प्रश्नकाल ही नहीं हुआ, शून्यकाल भी नहीं हो सका, तो क्या हजारों-लाखों मतदाताओं की आवाज सदन के भीतर दब नहीं गई? अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाने की तैयारी के साथ रोज सदन में आने वाले सांसदों से पूछा जाना चाहिए कि उनके संसदीय अधिकारों के इस्तेमाल का अवसर उनसे आखिर किसने छीना?

राज्यसभा में 285 तारांकित प्रश्न पूछे जाने थे, शून्यकाल में 380 विषय और विशेष उल्लेख के जरिए 380 मुद्दे उठाए जाने थे, लेकिन क्या यह लोकतंत्र की विडंबना नहीं कि इनमें से केवल 16 प्रश्न, 52 शून्यकाल के विषय और 93 विशेष उल्लेख ही सदन में लिए जा सके? क्या बाकी सवाल पूछने वाले सांसदों और उन सवालों के जवाब की प्रतीक्षा कर रही जनता को इसका हिसाब नहीं मिलना चाहिए? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सांसदों के लिए भी ‘नो वर्क, नो पेÓ का सिद्धांत नहीं होना चाहिए? अगर कोई कर्मचारी काम नहीं करता तो वेतन और जवाबदेही का सवाल उठता है, ऐसे में जनता के पैसे से चलने वाली संसद में लगातार व्यवधान डालने वालों पर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या सांसदों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे सदन को चलने न दें और फिर भी अपने कार्यकाल का पूरा लाभ लेते रहें?

हंगामे के बीच विधेयक पारित हुए, लेकिन क्या विपक्ष खुद से पूछेगा कि अगर वह संसद चलने देता तो इन विधेयकों पर और विस्तृत चर्चा नहीं हो सकती थी? लोक परीक्षा कानून में संशोधन, न्यायाधिकरण सुधार, केरल के नाम परिवर्तन, सहकारी विकास निगम, बैंककार बही साक्ष्य और खान एवं खनिज से जुड़े विधेयकों पर व्यापक बहस होती तो क्या जनता को इनके प्रभाव और प्रावधानों की अधिक स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती? क्या लोकतंत्र में विधेयक पास होना ही पर्याप्त है या यह भी जरूरी नहीं कि विपक्ष अपनी आपत्तियां सदन के रिकॉर्ड पर दर्ज कराए?

सरकार कह रही है कि 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन बहस और चर्चा के लिहाज से सत्र सफल नहीं रहा, तो क्या यह सत्ता पक्ष के लिए भी आत्ममंथन का विषय नहीं होना चाहिए? क्या सरकार को यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि महत्वपूर्ण विधेयक पर्याप्त चर्चा के बाद ही पारित हों? और क्या विपक्ष को यह नहीं समझना चाहिए कि चर्चा रोककर वह सरकार को ही नहीं, खुद को भी कमजोर करता है?

एफसीआरए संशोधन विधेयक को विस्तृत समीक्षा और सुझावों के लिए संयुक्त समिति के पास भेजा गया, तो क्या यह प्रमाण नहीं कि संसदीय प्रक्रिया में असहमति के लिए रास्ते मौजूद हैं? फिर हर मुद्दे का रास्ता हंगामा क्यों? क्या विरोध का अर्थ सदन बंद करना है या बहस को और धारदार बनाना? और क्या संसद सत्र से पहले राहुल गांधी के विदेश दौरों को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब भी सार्वजनिक विमर्श में नहीं आना चाहिए? क्या विपक्ष के सबसे बड़े नेता की संसद के प्रति उपस्थिति और सक्रियता पर सवाल पूछना गलत है? क्या विपक्ष यह बताएगा कि संसद के महत्वपूर्ण सत्रों से पहले उसकी राजनीतिक रणनीति क्या होती है और क्या जनता को इसका स्पष्ट जवाब नहीं मिलना चाहिए?

क्या विपक्ष अराजकता की ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जहां सरकार को काम ही न करने दिया जाए? क्या सत्ता पक्ष भी इस गतिरोध को तोडऩे के लिए पर्याप्त राजनीतिक पहल नहीं कर सकता था? क्या दोनों पक्षों की जिम्मेदारी नहीं थी कि टकराव के बीच भी संसद को चलाया जाता? और अगर दोनों पक्ष विफल रहे, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा? सांसद या वही जनता, जिसके टैक्स के पैसे से संसद चलती है?

क्या लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ बहुमत से कानून बनाना है? क्या लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ विरोध करना है? क्या लोकतंत्र का असली अर्थ सवाल पूछना, जवाब सुनना, तर्क देना, असहमति दर्ज करना और फिर निर्णय तक पहुंचना नहीं है? अगर प्रश्नकाल नहीं होगा, शून्यकाल नहीं होगा, बहस नहीं होगी और विधेयक हंगामे के बीच पारित होंगे, तो फिर संसद और राजनीतिक अखाड़े में फर्क क्या रह जाएगा? अंत में एक बार फिर सवाल उठता है कि क्या यही संसदीय लोकतंत्र है? और अगर नहीं, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों कब अपनी-अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे? सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों को मिलकर यह सोचना होगा कि संसदीय लोकतंत्र में जनता का विश्वास कैसे कायम रखा जाए। आखिर संसद की हर बैठक पर देश के लाखों-करोड़ों रुपए खर्च होते हैं और जब जनता अपनी आंखों के सामने सदनों को बार-बार हंगामे और व्यवधान के कारण ठप होते देखती है, तो उसके मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके पैसे और उसके जनादेश का कितना सम्मान हो रहा है।

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