-नई रिसर्च में दावा: आंखों से दिमाग तक पहुंचने वाले संकेतों की व्यवस्था ने तय किया हो सकता है शरीर की नसों का पूरा नेटवर्क
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!नई दिल्ली। हमारा दिमाग शरीर के विपरीत हिस्से को नियंत्रित करता है। दिमाग का दायां हिस्सा बाएं हाथ-पैर की गतिविधियों को नियंत्रित करता है, जबकि बायां हिस्सा शरीर के दाएं हिस्से को। यह व्यवस्था मनुष्यों के साथ-साथ कई अन्य रीढ़धारी जीवों में भी पाई जाती है। लेकिन आखिर प्रकृति ने दिमाग और शरीर के बीच ऐसी क्रॉस-वायरिंग क्यों विकसित की? वैज्ञानिकों ने अब इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए एक नई विकासवादी परिकल्पना पेश की है।
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के न्यूरोसाइंटिस्ट मार्टिन डब्ल्यू. वेसेंडॉर्फ और डैनियल डेली वांग के अनुसार, दिमाग की क्रॉस-वायरिंग की शुरुआत संभवतः लगभग 500 मिलियन वर्ष पहले प्राचीन मछलियों की दृश्य प्रणाली से हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि आंखों से दिमाग तक दृश्य संकेत पहुंचाने के लिए विकसित हुई व्यवस्था ने बाद में स्पर्श, दर्द और शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली नसों के संगठन को भी प्रभावित किया होगा।
यह शोध Frontiers in Neuroanatomy में प्रकाशित हुआ है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह एक विकासवादी परिकल्पना है, न कि ऐसा प्रयोग जिसमें क्रॉस-वायरिंग की उत्पत्ति को सीधे साबित कर दिया गया हो।
दिमाग का बायां हिस्सा दाएं शरीर को ही क्यों नियंत्रित करता है?
दिमाग और शरीर के बीच इस व्यवस्था को वैज्ञानिक भाषा में कॉन्ट्रालैटरल ऑर्गनाइजेशन (Contralateral Organization) कहा जाता है। इसका अर्थ है कि दिमाग का एक गोलार्ध (Hemisphere) शरीर के विपरीत हिस्से से आने वाली संवेदनात्मक जानकारी प्राप्त करता है और उसकी गतिविधियों को नियंत्रित करने में भूमिका निभाता है।
उदाहरण के लिए:
- दिमाग का दायां मोटर कॉर्टेक्स मुख्य रूप से शरीर के बाएं हिस्से की स्वैच्छिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
- दिमाग का बायां मोटर कॉर्टेक्स मुख्य रूप से शरीर के दाएं हिस्से की गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
- बाएं हाथ से आने वाले कई स्पर्श और संवेदनात्मक संकेत दिमाग के दाएं हिस्से तक पहुंचते हैं।
- दाएं हाथ से आने वाले कई संकेत दिमाग के बाएं हिस्से तक पहुंचते हैं।
- हालांकि, यह व्यवस्था हर तंत्रिका मार्ग में एक जैसी नहीं होती। कुछ तंत्रिका मार्ग शरीर के उसी हिस्से से जुड़े रहते हैं, जबकि कुछ दोनों तरफ संकेत भेजते हैं।
- यही कारण है कि दिमाग और शरीर के बीच क्रॉस-वायरिंग को समझने के लिए वैज्ञानिकों को अलग-अलग तंत्रिका मार्गों का अध्ययन करना पड़ता है।
आंखों से शुरू हुई क्रॉस-वायरिंग की कहानी
- वैज्ञानिकों की नई परिकल्पना का केंद्र ऑप्टिक टेक्टम (Optic Tectum) नाम की एक प्राचीन मस्तिष्क संरचना है। यह दिमाग के मिडब्रेन में मौजूद होती है और आसपास की परिस्थितियों के प्रति तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद करती है। मनुष्यों और अन्य स्तनधारियों में इसी संरचना को सुपीरियर कोलिकुलस (Superior Colliculus) कहा जाता है।
- आंखों से आने वाले दृश्य संकेत ऑप्टिक नर्व के जरिए दिमाग तक पहुंचते हैं। आंख के लेंस के कारण रेटिना पर बनने वाला दृश्य उल्टा होता है। इसके बाद ऑप्टिक कियाज्म (Optic Chiasm) नामक स्थान पर आंखों से आने वाली नसों का एक हिस्सा दूसरी तरफ जाता है।
- इस व्यवस्था के कारण दृश्य क्षेत्र के दाएं हिस्से की जानकारी दिमाग के बाएं हिस्से तक पहुंचती है, जबकि दृश्य क्षेत्र के बाएं हिस्से की जानकारी दिमाग के दाएं हिस्से तक पहुंचती है।
- यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि बाईं आंख की सारी जानकारी दिमाग के दाएं हिस्से में और दाईं आंख की सारी जानकारी दिमाग के बाएं हिस्से में जाती है। दोनों आंखों से आने वाली जानकारी का वितरण दृश्य क्षेत्र के आधार पर होता है।
- वैज्ञानिकों के अनुसार, प्राचीन जीवों में दृश्य संकेतों की यह क्रॉस-वायर्ड व्यवस्था पहले से मौजूद थी। बाद में विकसित होने वाली दूसरी तंत्रिका प्रणालियों ने भी इसी व्यवस्था के अनुरूप अपना संगठन विकसित किया होगा।
500 मिलियन साल पहले कैसी थी दिमाग की संरचना?
शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में प्राचीन जबड़े रहित मछलियों (Jawless Fish) का उल्लेख किया है। आज जीवित लैम्प्रे (Lamprey) और हैगफिश (Hagfish) जैसे जीव प्राचीन जबड़े रहित मछलियों के विकासवादी इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग 500 मिलियन वर्ष पहले, कैम्ब्रियन काल के दौरान, रीढ़धारी जीवों के पूर्वजों में ऑप्टिक कियाज्म और ऑप्टिक टेक्टम जैसी संरचनाएं मौजूद रही होंगी। यह समय आधुनिक मनुष्यों, स्तनधारियों और चार पैरों वाले जीवों के विकास से बहुत पहले का है।
शोधकर्ताओं का तर्क है कि यदि दृश्य प्रणाली में क्रॉस-वायरिंग इतनी प्राचीन थी, तो बाद में विकसित होने वाली संवेदनात्मक और मोटर प्रणालियों ने भी उसी व्यवस्था को अपनाया होगा। हालांकि, प्राचीन जीवों के दिमाग को सीधे देख पाना संभव नहीं है। इसलिए यह निष्कर्ष आधुनिक जीवों की तंत्रिका संरचनाओं की तुलना और विकासवादी इतिहास के आधार पर निकाला गया है।
स्पर्श और दर्द की नसें भी दूसरी तरफ क्यों जाती हैं?
दिमाग तक पहुंचने वाले संकेत केवल आंखों से नहीं आते। शरीर के अलग-अलग हिस्सों से स्पर्श, दर्द, तापमान और शरीर की स्थिति से संबंधित जानकारी भी दिमाग तक पहुंचती है।
शोधकर्ताओं ने दो प्रमुख संवेदनात्मक तंत्रिका मार्गों का अध्ययन किया।
डॉर्सल कॉलम पाथवे
यह तंत्रिका मार्ग हल्के स्पर्श, कंपन और शरीर के अंगों की स्थिति से जुड़ी जानकारी दिमाग तक पहुंचाता है। इसकी नसें रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर बढ़ती हैं। इसके बाद ब्रेनस्टेम में पहुंचकर दूसरी तरफ पार होती हैं और आगे दिमाग तक जाती हैं। यह व्यवस्था चार पैरों वाले जीवों यानी टेट्रापॉड्स (Tetrapods) में व्यापक रूप से पाई जाती है। इनमें उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी शामिल हैं।
स्पाइनोथैलेमिक ट्रैक्ट
यह तंत्रिका मार्ग दर्द, तापमान, खुजली और कुछ प्रकार के स्पर्श से संबंधित संकेतों को दिमाग तक पहुंचाता है। डॉर्सल कॉलम पाथवे से अलग, इसकी नसें रीढ़ की हड्डी के भीतर ही दूसरी तरफ पार हो जाती हैं। इसके बाद ये संकेत थैलेमस तक पहुंचते हैं, जो दिमाग में संवेदनात्मक जानकारी को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इन दोनों प्रणालियों की क्रॉस-वायरिंग यह संकेत देती है कि दिमाग और शरीर के बीच विपरीत दिशा में संकेत पहुंचाने वाली व्यवस्था विकासवादी इतिहास में काफी पुरानी है।
शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली नसें भी क्रॉस-वायर्ड
दिमाग और शरीर के बीच क्रॉस-वायरिंग केवल संवेदनात्मक जानकारी तक सीमित नहीं है। शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली कई नसें भी इसी व्यवस्था का पालन करती हैं।
शोधकर्ताओं ने तीन प्रमुख तंत्रिका मार्गों पर चर्चा की
तंत्रिका मार्ग प्रमुख कार्य
टेक्टोस्पाइनल पाथवे दृश्य और अन्य संकेतों के आधार पर सिर तथा शरीर को दिशा देने में मदद
रूब्रोस्पाइनल पाथवे अंगों की गतिविधियों और मोटर नियंत्रण में भूमिका
कॉर्टिकोस्पाइनल ट्रैक्ट स्वैच्छिक गतिविधियों, विशेषकर हाथों और उंगलियों की सटीक गतिविधियों में योगदान
टेक्टोस्पाइनल पाथवे आसपास की परिस्थितियों के प्रति तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद करता है।
उदाहरण के लिए, यदि सड़क पार करते समय अचानक किसी दिशा से वाहन आता दिखाई दे, तो व्यक्ति तेजी से अपना सिर या शरीर उस दिशा में घुमा सकता है। ऐसी प्रतिक्रियाओं में दिमाग के कई तंत्रिका मार्ग शामिल होते हैं।
कॉर्टिकोस्पाइनल ट्रैक्ट मनुष्यों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह दिमाग के मोटर कॉर्टेक्स से रीढ़ की हड्डी तक संकेत पहुंचाता है और हाथों तथा उंगलियों की सटीक गतिविधियों में योगदान देता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, स्तनधारियों में दिमाग की बाहरी परत यानी नियोकोर्टेक्स के विकसित होने से पहले ही कई प्रमुख तंत्रिका मार्ग क्रॉस-वायर्ड हो चुके थे। बाद में नियोकोर्टेक्स ने इसी पुरानी व्यवस्था के साथ जुड़कर काम करना शुरू किया होगा।
क्या क्रॉस-वायरिंग का कोई विशेष फायदा है?
यह इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
अब तक वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल रहा है कि क्या दिमाग और शरीर के बीच क्रॉस-वायरिंग किसी विशेष जैविक लाभ के कारण विकसित हुई थी?
नई परिकल्पना इसके लिए एक अलग संभावना प्रस्तुत करती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि संभव है क्रॉस-वायरिंग किसी एक विशेष लाभ के लिए विकसित नहीं हुई हो। बल्कि यह प्राचीन दृश्य प्रणाली की संरचना से जुड़ी एक विकासवादी विरासत हो सकती है।
इसे विकासवादी बाध्यता या इवोल्यूशनरी पाथ डिपेंडेंसी (Evolutionary Path Dependency) के रूप में समझा जा सकता है। प्रकृति में नई जैविक संरचनाएं अक्सर पहले से मौजूद संरचनाओं के आधार पर विकसित होती हैं। हर बार पूरी तरह नई व्यवस्था बनाना जरूरी नहीं होता।
यदि प्राचीन जीवों में दृश्य प्रणाली पहले ही क्रॉस-वायर्ड थी, तो बाद में विकसित होने वाली दूसरी प्रणालियों के लिए उसी व्यवस्था को अपनाना अपेक्षाकृत आसान रहा होगा। हालांकि, यह कहना अभी सही नहीं होगा कि क्रॉस-वायरिंग का कोई अन्य जैविक लाभ नहीं है। शोधकर्ताओं ने इस संभावना को अंतिम रूप से खारिज नहीं किया है।
क्या इस खोज से स्ट्रोक और लकवे को समझने में मदद मिलेगी?
दिमाग और शरीर के बीच नसों की संरचना को समझना न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। क्रॉस-वायरिंग की व्यवस्था के कारण दिमाग के किसी विशेष हिस्से में चोट या बीमारी होने पर शरीर के विपरीत हिस्से में लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
उदाहरण के लिए, दिमाग के दाएं हिस्से में स्ट्रोक होने पर शरीर के बाएं हिस्से में कमजोरी या लकवा हो सकता है। इसके विपरीत, दिमाग के बाएं हिस्से में स्ट्रोक होने पर शरीर के दाएं हिस्से पर असर पड़ सकता है। हालांकि, वर्तमान शोध मुख्य रूप से दिमाग की क्रॉस-वायरिंग के विकासवादी इतिहास को समझने पर केंद्रित है। इससे किसी बीमारी का नया उपचार विकसित होने का दावा अभी नहीं किया जा सकता, लेकिन यह अध्ययन भविष्य में दिमाग की संरचना, तंत्रिका मार्गों और उनके विकासवादी इतिहास को बेहतर समझने में मदद कर सकता है।
शोध की सीमाएं: क्या वैज्ञानिकों ने सचमुच रहस्य सुलझा लिया?
शोध के निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसे अंतिम वैज्ञानिक जवाब नहीं माना जा सकता। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने नए जीवों पर प्रयोग करने के बजाय पहले से प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा की है। शोधकर्ताओं ने विभिन्न जीवों की तंत्रिका संरचनाओं की तुलना करके यह परिकल्पना प्रस्तुत की कि क्रॉस-वायरिंग की शुरुआत प्राचीन मछलियों की दृश्य प्रणाली से हुई होगी।
इस परिकल्पना की पुष्टि के लिए अभी कई सवालों के जवाब जरूरी हैं
- क्या प्राचीन मछलियों में क्रॉस-वायरिंग का यही स्वरूप मौजूद था?
- क्या जीवाश्मों में ऑप्टिक कियाज्म और ऑप्टिक टेक्टम के प्रमाण मिल सकते हैं?
- क्या सभी रीढ़धारी जीवों में क्रॉस-वायरिंग का विकास एक ही प्रक्रिया से हुआ?
- क्या क्रॉस-वायरिंग का कोई ऐसा जैविक लाभ भी है, जिसे अभी समझा नहीं गया है?
शोधकर्ताओं ने भविष्य में प्राचीन मछलियों के जीवाश्मों का अध्ययन करने और विभिन्न जीवों में तंत्रिका संरचनाओं की तुलना करने का सुझाव दिया है। इसलिए फिलहाल यह कहना अधिक सही होगा कि वैज्ञानिकों ने दिमाग की क्रॉस-वायरिंग के रहस्य को समझने के लिए एक नई और महत्वपूर्ण परिकल्पना प्रस्तुत की है।
