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मप्र हिन्दी में MBBS की पढ़ाई प्रारंभ करने वाला पहला राज्य

aaptak.co.in1@gmail.com September 13, 2026
  • विश्‍वास कैलाश सारंग, मंत्री, मप्र शासन

स्टीफन स्पेंडर की तरह कहें तो सर्जना के स्तर पर भाषा, अपनी भाषा एक आध्यात्मिक गतिविधि है या टाल्सटाय के शब्दों में यहाँ आध्यात्मिक सक्रियता के स्त्रोत प्रवाहित होते हैं या मुक्तिबोध के शब्दों में ‘स्व’ से ऊपर उठना, अन्य के मर्म में प्रवेश करना मनुष्यता का सबसे बड़ा लक्षण है। और यह लक्षण हिन्दी में शब्द बनते ही दिखाई देने लगता है। आकार, अक्षर और ध्वनि का एकाकार जिस भाषा में हुआ वह सिर्फ हिन्दी है।

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इसलिए मैं गिलक्राइस्ट जैसे लोगों का सख्त विरोधी हूं जो हिन्दी को गंवारू और हिन्दुओं की भाषा कहता था। ‘गार्सा-द-तासी’ ने लिखा था हिन्दी में हिन्दू धर्म का आभास है। इसलिए यदि हिन्दी के लोकवृत्त को समझना हो तो भक्ति आंदोलन को समझना जरुरी है। जब कबीर कहते हैं ‘कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ’ तो वो बाजार का नहीं उसकी माया का विरोध कर रहे हैं या विद्यापति की उम्मीद ‘बिपत अपत तरु पाओल रे पुन नव नव पात’। यह हिन्दी का संदेश है कि जो पत्ते सूख गए हैं तो उनमें फिर नए पत्ते आएंगे। हमारे देश में उदारवाद के पगचिन्ह भक्तिकाल में साफ-साफ दिखाई देते हैं। आखिर मथुरा में आचार्य वल्लभ पहुंचे, चैतन्य पहुंचे और इन सभी ने सामुदायिक खाइयों को पाटने का काम किया।

हिन्दी की पाचनशक्ति अद्भुत है। इसमें दुनियाभर की भाषाओं के शब्द हैं और वे अतिथि शब्द नहीं है बल्कि आत्मसात कर लिए गए शब्द हैं। ऐसा दुनिया की कोई भाषा नहीं कर सकी। अंग्रेजी भी नहीं जिसकी सर्वाधिक डुग्गी हमारे देश में पीटी जाती है। अंग्रेजी से पहले वहाँ लैटिन और ग्रीक बोली जाती थी यही अभिजात्य वर्ग की भाषा थी। अंग्रेजी उस समय अभिजात्यों की नहीं हाशिए पर जी रहे गरीबों और मजदूरों की भाषा थी। उनके शब्द लिए गए मगर अंग्रेजी उन्हें आत्मसात नहीं कर पायी। जैसे जॉन कीट्स की एक कविता का शीर्षक है “ला बेले डेम सैंस मर्सी” यानि एक दयाहीन सुंदर महिला यह शीर्षक 15वीं शताब्दी का है। अंग्रेजी में यह कविता बेहद चर्चित है, जिसमें एक परी शूरवीर को सम्मोहित करके अप्रिय भाग्य का श्राप देती है। हिंदी सिर्फ एक भाषा ही नहीं भारत की संस्कृति है। यह उदार और निर्माणात्मक में सुन भर लीजिए तो हिन्दी स्मृति में बसने लगती है।

हमारे यशस्वी और श्रद्धेय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की पंक्तियां है- “आसमान में सिर उठाकर, घने बादलों को चीरकर, रोशनी का संकल्प लें, अभी तो सूरज उगा है। दृढ़ निश्चय के साथ चलकर, हर मुश्किल को पार कर,घोर अंधेरे को मिटाने, अभी तो सूरज उगा है।”
आज सूरदास कोलंबिया में, मीरा अमेरिका के कई बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही हैं। जायसी पढ़ाए जा रहे हैं। हिन्दी का अर्थ ही नहीं शब्द-शब्द श्लोक है। जो बोलते ही सूखे गेहूँ के दाने सा खनकता है। हिन्दी के निकट बैठकर महात्मा गांधी दिखाई देने लगते हैं अर्थात हर गरीब मन का दर्द जहां नव गीत में ढ़लने लगे वह हमारी भाषा है हिंदी।

देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का निरंतर प्रयास रहा है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था भारतीय भाषाओं, भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय प्रतिभा की शक्ति के अनुरूप आगे बढ़े। लंबे समय तक अंग्रेजी को उच्च शिक्षा और विशेषकर चिकित्सा एवं तकनीकी शिक्षा का प्रमुख माध्यम माना जाता रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण, गरीब, किसान और सामान्य परिवारों से आने वाले अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए उच्च स्तरीय शिक्षा तक पहुंच का मार्ग अपेक्षाकृत कठिन बना रहा। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने शिक्षा में भारतीय भाषाओं के महत्व को नई दिशा दी। यह केवल भाषा परिवर्तन का विषय नहीं है बल्कि यह शिक्षा को अधिक समावेशी, सहज और विद्यार्थी-केंद्रित बनाने की व्यापक सोच का हिस्सा बना।

प्रधानमंत्री जी के इसी संकल्प को धरातल पर उतारते हुए मध्यप्रदेश ने चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल की। मुझे इस बात का गर्व है कि चिकित्सा शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य करते हुए हम मध्यप्रदेश का नाम उस ऐतिहासिक उपलब्धि से जोड़ने में सफल रहे, जब मध्यप्रदेश ने हिन्दी माध्यम में एमबीबीएस की पढ़ाई प्रारंभ करने वाला देश का पहला राज्य होने का गौरव हासिल किया। यह केवल मध्यप्रदेश के लिए उपलब्धि नहीं थी बल्कि भारतीय भाषाओं के प्रति विश्वास को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम था।

16 अक्टूबर 2022 वो ऐतिहासिक दिन जब भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी के करकमलों द्वारा एमबीबीएस प्रथम वर्ष की हिन्दी पुस्तकों का विमोचन किया गया और हिंदी में मेडिकल शिक्षा के नए अध्याय का शुभारंभ हुआ। यह क्षण इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि पहली बार चिकित्सा जैसे अत्यंत तकनीकी और विशेषज्ञता वाले विषय में भारतीय भाषा को शिक्षा के प्रभावी माध्यम के रूप में बड़े स्तर पर स्थापित करने का प्रयास किया गया।

हमारा उद्देश्य कभी यह नहीं रहा कि हिन्दी को अंग्रेजी के विरोध में खड़ा किया जाए। उद्देश्य यह है कि भाषा किसी विद्यार्थी की प्रतिभा के मार्ग में बाधा न बने। रोजमर्रा की जिंदगी में जिस भाषा में विद्यार्थी सोचता है, परिवार से संवाद करता है और अपने अनुभवों को समझता है, उसी भाषा में कठिन अवधारणाओं को समझना उसके लिए स्वाभाविक रूप से अधिक सहज हो सकता है।

हिन्दी में एमबीबीएस का पाठ्यक्रम तैयार करना सामान्य अनुवाद का कार्य नहीं था। चिकित्सा विज्ञान की शब्दावली, अवधारणाओं और तकनीकी विषयों को विद्यार्थियों के लिए वैज्ञानिक रूप से सही, सहज और समझने योग्य रूप में प्रस्तुत करना एक बड़ी चुनौती थी। इसी उद्देश्य से चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत हिन्दी में एमबीबीएस पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए पृथक हिन्दी पाठ्यक्रम प्रकोष्ठ का गठन किया गया तथा विशेषज्ञों की उच्च स्तरीय टास्क फोर्स के माध्यम से कार्ययोजना तैयार की गई। चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों की सहभागिता से पाठ्यक्रम और पुस्तकों को चरणबद्ध एवं व्यवस्थित रूप से तैयार करने का कार्य किया गया।
हिन्दी पुस्तकों के रूपांतरण और चिकित्सा शिक्षा की इस पूरी प्रक्रिया को संस्थागत स्वरूप देने के लिए हिन्दी चिकित्सा प्रकोष्ठ ‘मंदार’ का विधिवत गठन किया गया। जिस प्रकार समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त हुआ था, उसी प्रकार ज्ञान के मंथन, विशेषज्ञों के परिश्रम और संकल्प की साधना से ‘मंदार’ के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक नया अमृत निकला। महीनों के अथक परिश्रम, विशेषज्ञों के ज्ञान और मिशन मोड में किए गए कार्य के परिणामस्वरूप एमबीबीएस की पुस्तकों और पाठ्यक्रम को हिन्दी में उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त हुई।

हिन्दी में चिकित्सा शिक्षा की शुरुआत केवल प्रथम वर्ष तक सीमित नहीं रही। प्रथम वर्ष की पुस्तकों के विमोचन के बाद हिन्दी चिकित्सा प्रकोष्ठ ‘मंदार’ में एमबीबीएस द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ वर्ष की पुस्तकों के लिप्यंतरण एवं पाठ्यक्रम संबंधी कार्य को भी आगे बढ़ाया गया। यह क्रम बताता है कि मध्यप्रदेश की पहल किसी प्रतीकात्मक कार्यक्रम तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे एक व्यापक और दीर्घकालिक दृष्टि थी चिकित्सा शिक्षा को भारतीय भाषाओं में अधिक सुलभ बनाना।

मध्यप्रदेश की इस पहल के बाद छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने भी हिन्दी में एमबीबीएस शिक्षा की दिशा में पहल की। हिन्दी में एमबीबीएस भारतीय भाषाओं के लिए एक सकारात्मक राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत साबित हुई। आज देश के अन्य राज्य भी अपनी हिन्दी में चिकित्सा शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए मध्यप्रदेश से मार्गदर्शन ले रहे हैं। यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि प्रदेश ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई।

हिन्दी में एमबीबीएस की शुरुआत मेरे सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। यह मेरे लिए उस संकल्प की जीत है जिसमें गांव के बच्चे, गरीब परिवार के बच्चे और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाला विद्यार्थी भी डॉक्टर बनने का सपना पूरे आत्मविश्वास के साथ देख सके।

आज जब हम राष्ट्रीय हिन्दी दिवस मना रहे हैं, तब हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को केवल बोलचाल तक सीमित नहीं रखा जाएगा। उन्हें ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान, चिकित्सा, तकनीक और नवाचार की भाषाओं के रूप में भी निरंतर सशक्त बनाया जाएगा।

मेरी भाषा, आपकी, हमारी और इस देश की भाषा अनहद राग है। इसकी संवेदना की गहराई और पवित्रता गैरिक वसना है। जैसे कबीर ने कहा है कि “पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भया उजास। मुखि कस्तूरी महमही, बाणी फूटी बास” अर्थात् जब इस शरीर रूपी पिंजरे में प्रभु-प्रेम का दीपक जलता है, तो हृदय के भीतर का अंधकार मिट जाता है और पूरा अंतःकरण प्रकाशमान हो जाता है। इस दिव्य प्रेम के प्रभाव से साधक का मुख कस्तूरी की तरह महकने लगता है यानि उसके मुख और वाणी से केवल ईश्वर के नाम और प्रेम की सुगंध (पवित्र विचार) ही चारों तरफ बिखरने लगती है।

(लेखक ने ही मध्यप्रदेश को देश में पहली बार एमबीबीएस की पढ़ाई हिन्दी में कराने वाला देश का पहला राज्य होने का गौरव दिलाया )

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