- डॉ. जितेंद्र कुमार सिंह ‘संजय‘
—प्रहलाद सिंह पटेल की कृति में नर्मदा परिक्रमा के बहाने आत्ममंथन, कर्म, कृपा, पर्यावरण और मानव जीवन के गहरे सवालों की पड़ताल
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!नर्मदा भारत की उन नदियों में शामिल हैं, जिनका महत्व केवल भूगोल तक सीमित नहीं है। उनके तटों पर सदियों से आस्था, साधना, लोककथाएं और सांस्कृतिक परंपराएं विकसित होती रही हैं। नर्मदा को लेकर भारतीय समाज की संवेदना में नदी के साथ-साथ प्रकृति, तप, त्याग और आत्मशुद्धि की अवधारणा भी जुड़ी हुई है। इसी व्यापक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा के बीच प्रहलाद सिंह पटेल की कृति ‘परिक्रमा कृपा सार’ सामने आती है।
डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह ‘संजय’ की विवेचना पर आधारित यह कृति नर्मदा परिक्रमा को केवल एक धार्मिक यात्रा के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे बाहरी यात्रा से आंतरिक यात्रा की ओर बढ़ने वाली प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है। पुस्तक में नर्मदा नदी, पदयात्रा, गुरु-सान्निध्य, कर्म, कृपा, निर्विकारता, पर्यावरण, सामाजिक जीवन और आत्ममंथन जैसे अनेक विषय एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं।
नर्मदा: नदी से आगे संस्कृति की प्रवाहमान चेतना
नर्मदा का उल्लेख भारतीय परंपरा में केवल एक जलधारा के रूप में नहीं मिलता। उनके साथ लोककथाओं, पुराणों और साधना की लंबी परंपरा जुड़ी है। पुस्तक की विवेचना में नर्मदा के सौंदर्य को स्थिरता के बजाय निरंतर गतिशीलता का सौंदर्य बताया गया है। शैलों से टकराती जलधारा, वनाच्छादित घाटियां, घाटों पर साधना और पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा नर्मदा को विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान देती है।
नर्मदा से जुड़ी लोककथा में मेकल की पुत्री नर्मदा, शोणभद्र और जुहिला का प्रसंग प्रेम, विरह और वैराग्य के प्रतीकों के रूप में सामने आता है। यह कथा ऐतिहासिक सत्य से अधिक सांस्कृतिक सत्य का प्रतिनिधित्व करती है। भारतीय दृष्टि ने नदी को केवल प्राकृतिक संसाधन मानने के बजाय उसमें जीवन, भावनाओं और आध्यात्मिकता के तत्व देखे।
पुराणों में नर्मदा के माहात्म्य का विस्तार मिलता है। पुस्तक में नर्मदा को शिवसम्भवा, रेवा, पापहारिणी और मोक्षदा जैसी अवधारणाओं से जोड़ा गया है। इसी धार्मिक दृष्टि में नर्मदा का दर्शन भी पवित्रता का माध्यम माना गया है।
‘परिक्रमा कृपा सार’ केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं
पुस्तक का स्वर किसी सामान्य यात्रा-विवरण से अलग है। इसमें नर्मदा परिक्रमा के अनुभवों के साथ गुरु-सान्निध्य, राजनीतिक-सामाजिक जीवन, आत्ममंथन और जीवन के मूल प्रश्नों पर विचार दिखाई देते हैं।
ग्रंथ में 1994, 1995, 1996 और 1997 में लिखे गए अनेक चिंतन भी शामिल हैं। इस कारण यह रचना एक व्यवस्थित आत्मकथा की तुलना में साधना-डायरी के अधिक निकट दिखाई देती है। कहीं लेखक स्वयं से सवाल करता है, कहीं गुरु-वाणी से दिशा मिलती है, तो कहीं समाज, राजनीति, पर्यावरण और नैतिकता के प्रश्न सामने आते हैं।
तीन शब्दों में पुस्तक का दर्शन
परिक्रमा, कृपा और सार—ये तीन शब्द पुस्तक की पूरी वैचारिक यात्रा को समझने की कुंजी हैं।
परिक्रमा का अर्थ किसी केंद्र के चारों ओर चलना है। आध्यात्मिक अर्थ में इसका संकेत यह है कि जीवन में परिस्थितियां, पद, सफलता और असफलता बदलती रहें, लेकिन व्यक्ति के भीतर सत्य, धर्म, आत्मबोध और शुचिता का केंद्र स्थिर रहे।
कृपा को पुस्तक चमत्कार या निष्क्रिय प्रतीक्षा के रूप में नहीं देखती। इसका भाव है कि कर्म और पात्रता के माध्यम से कृपा का अनुभव होता है। वहीं ‘सार’ जीवन के लंबे अनुभवों, संघर्षों और आत्ममंथन के बाद बचने वाला निष्कर्ष है।
पदयात्रा बनी आत्ममंथन का माध्यम
प्रहलाद सिंह पटेल के जीवन में पदयात्राओं की भूमिका पुस्तक में प्रमुखता से सामने आती है। इसमें 1988 की नशे के विरुद्ध 32 दिवसीय पदयात्रा, 1992 की गोटेगांव यात्रा, 1993 की सिवनी क्षेत्र की साइकिल यात्रा, 1994 से 1996 की नर्मदा परिक्रमा और 2005 की सपरिवार 112 दिवसीय नंगे पैर नर्मदा यात्रा का उल्लेख है।
शुरुआती यात्राओं के पीछे सामाजिक और राजनीतिक कारण भी थे, लेकिन समय के साथ यात्रा का अर्थ बदलता गया। लोगों से सीधा संपर्क और उनका अपनापन लेखक के लिए यात्रा को जनसंपर्क से आगे आत्मसंपर्क का माध्यम बनाता है।
पुस्तक में पदयात्रा को समाज को करीब से समझने की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। पैदल चलने वाला व्यक्ति केवल स्थानों से नहीं गुजरता, बल्कि लोगों, गांवों और प्रकृति के साथ प्रत्यक्ष संबंध बनाता है।
नर्मदा भक्ति से पर्यावरण संरक्षण तक
‘परिक्रमा कृपा सार’ का एक महत्वपूर्ण पक्ष नर्मदा की धार्मिक आस्था को पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जोड़ना है। पुस्तक में इस बात पर जोर है कि नदी में प्रदूषण के कारणों को समझने के लिए उसके स्रोत तक पहुंचना आवश्यक है।
यह विचार केवल नदी तक सीमित नहीं रहता। पुस्तक के अनुसार किसी भी समस्या के स्थायी समाधान के लिए उसके उद्गम को समझना जरूरी है। नदी में गंदगी है तो उसके स्रोत की पहचान होनी चाहिए; मन अशांत है तो अशांति के कारण तक जाना होगा; सामाजिक विकृति है तो उसके पीछे मौजूद मानसिकता को समझना होगा।
इस तरह नर्मदा को माता मानने की भावना केवल पूजा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नदी की स्वच्छता और पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जुड़ जाती है।
निर्विकारता का अर्थ क्या है?
ग्रंथ के आध्यात्मिक केंद्र में श्रीश्रीबाबाश्री और उनके ‘निर्विकार पथ’ की अवधारणा है। पुस्तक में निर्विकारता को केवल नशामुक्ति या बाहरी विकारों से मुक्ति तक सीमित नहीं किया गया है।
सत्ता, पद, धन, प्रतिष्ठा, प्रशंसा और ज्ञान का अहंकार भी मनुष्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए निर्विकार होने का अर्थ भावशून्य होना नहीं, बल्कि भावों को शुद्ध रखना है।
व्यक्ति संघर्ष करे लेकिन द्वेष न रखे, सफलता मिले लेकिन अहंकार न बढ़े, पराजय आए लेकिन आत्मद्वेष न पैदा हो और प्रशंसा मिले लेकिन वह जीवन का आधार न बन जाए—पुस्तक की दृष्टि में यही निर्विकार जीवन की दिशा है।
कर्म के साथ जुड़ी है कृपा
पुस्तक का एक केंद्रीय प्रश्न है—कर्म कैसे किया जाए? केवल कर्म करने की बात पर्याप्त नहीं मानी गई है। कर्म के पीछे की भावना, कर्म करने की प्रक्रिया और परिणाम के बाद व्यक्ति का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण है।
यदि व्यक्ति किसी अच्छे कार्य के बाद लगातार ‘मैंने किया’ की भावना से भरता जाए, तो वही कर्म अहंकार का कारण बन सकता है। इसलिए पुस्तक कर्म को साधना से जोड़ती है।
कृपा भी कर्म का विकल्प नहीं है। कर्म छोड़कर कृपा की प्रतीक्षा करना पुस्तक की दृष्टि में उचित मार्ग नहीं है। पहले कर्म, फिर पात्रता और उसके बाद कृपा का अनुभव—यह विचार कृति में बार-बार उभरता है।
अनुभव और अनुभूति में अंतर
‘परिक्रमा कृपा सार’ अनुभव और अनुभूति के बीच महत्वपूर्ण अंतर रेखांकित करती है। व्यक्ति की आयु बढ़ने के साथ अनुभव बढ़ सकता है, लेकिन अनुभव अपने आप अनुभूति नहीं बनता।
धर्म के बारे में बहुत पढ़ लेना धार्मिक आचरण की गारंटी नहीं है। अनेक तीर्थ कर लेना भी अहंकार को समाप्त नहीं करता। लंबे सार्वजनिक जीवन का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपने आप लोकहित का मर्म समझ ले।
अनुभव तब सार्थक होता है, जब वह व्यक्ति के भीतर परिवर्तन पैदा करे और उसके व्यवहार में दिखाई दे।
अच्छे कर्म में भी छिप सकता है अहंकार
पुस्तक अहंकार के एक सूक्ष्म रूप की ओर ध्यान दिलाती है। सामान्यतः मनुष्य बुरे कर्मों को अहंकार से जोड़ता है, लेकिन अच्छे कर्म भी यदि आत्मप्रशंसा का माध्यम बन जाएं तो समस्या पैदा हो सकती है।
सेवा करने वाला अपनी सेवा पर गर्व कर सकता है, विद्वान अपने ज्ञान पर और धार्मिक व्यक्ति अपनी धार्मिकता पर। सार्वजनिक जीवन में यह चुनौती और जटिल हो जाती है, क्योंकि वहां पद, प्रशंसा, आलोचना और सत्ता लगातार व्यक्ति की परीक्षा लेते हैं।
तृप्ति से शांति और शांति से मोक्ष
आधुनिक जीवन की अतृप्ति को भी पुस्तक एक महत्वपूर्ण समस्या के रूप में देखती है। संसाधन और सुविधाएं बढ़ने के बावजूद यदि व्यक्ति को ‘पर्याप्त’ का अनुभव नहीं है तो असंतोष बना रह सकता है।
पुस्तक के विचार में तृप्ति से संतुष्टि और संतुष्टि से चित्त की शांति की दिशा खुलती है। मोक्ष को भी केवल मृत्यु के बाद मिलने वाली स्थिति नहीं माना गया है। मोह, लोभ, फलासक्ति और अहंकार से मुक्ति के छोटे-छोटे अनुभव जीवन के भीतर भी संभव हैं।
वाणी से ज्यादा महत्वपूर्ण आचरण
कृति में चेतना के ‘स्वर’ और ‘स्वरूप’ के बीच अंतर किया गया है। धर्म, संस्कृति और नैतिकता की बातें करना आसान है, लेकिन उन्हें जीवन में उतारना कठिन।
बाहरी रूप और आंतरिक शुद्धता को समझाने के लिए पानी की टंकी का उदाहरण दिया गया है। यदि टंकी बाहर से साफ और सुंदर हो लेकिन भीतर गंदगी हो, तो उसमें रखा पानी शुद्ध नहीं हो सकता।
इसी तरह धार्मिक पहचान, सार्वजनिक छवि या संस्थागत चमक से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का वास्तविक आचरण है। पुस्तक का आग्रह है कि वाणी की तुलना में व्यवहार चेतना की वास्तविक कसौटी बने।
धर्म और न्याय की व्यापक व्याख्या
कृति में धर्म को किसी एक पूजा-पद्धति या संप्रदाय तक सीमित नहीं किया गया है। धर्म को ऐसी शक्ति के रूप में देखा गया है जो सत्य, नीति, न्याय और लोकमंगल को धारण करती है।
इसी दृष्टि से राजनीति में धर्म का अर्थ धार्मिक प्रतीकों की मौजूदगी नहीं, बल्कि सत्ता और निर्णयों को नैतिक मर्यादा से जोड़ना है। न्याय के संबंध में भी पुस्तक व्यक्ति की सीमित दृष्टि और नैतिक अहंकार से सावधान करती है। स्वयं को पूर्णतः सही मान लेना कई बार अन्याय की संभावना पैदा कर सकता है।
मनुष्य से मानव बनने की दिशा
कृति की अंतिम वैचारिक दिशा ‘मनुष्य से मानव’ बनने की है। पुस्तक ऐसे नागरिक की कल्पना करती है, जो अधिकारों के साथ दायित्वों को भी समझे, सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहयोग करे और नैतिकता को व्यवहार में उतारे।
इस दृष्टि में निर्विकारता केवल व्यक्तिगत साधना नहीं रह जाती। यह सामाजिक जीवन में भी उपयोगी मूल्य बनती है। लोभ से मुक्त व्यक्ति अधिक निष्पक्ष निर्णय ले सकता है, प्रशंसा का भूखा व्यक्ति नहीं होने पर सार्वजनिक दायित्व अधिक संतुलित ढंग से निभाया जा सकता है और क्रोध पर नियंत्रण व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी विवेकपूर्ण बनाए रख सकता है।
‘अल्पविराम’ क्यों, पूर्णविराम क्यों नहीं?
कृति का अंतिम भाव ‘अल्पविराम’ है। यह शब्द पुस्तक की पूरी यात्रा का प्रतीक बन जाता है। परिक्रमा समाप्त नहीं हुई, आत्मशोधन समाप्त नहीं हुआ और मनुष्य से मानव बनने की प्रक्रिया भी जारी है।
अंतिम प्रार्थना में किसी चमत्कारी उपलब्धि की मांग नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में सुंदर ढंग से जीने, क्रोध में शांत रहने, कठिन काम में निष्ठा बनाए रखने, आलोचना में अपनी कमी स्वीकार करने और प्रशंसा के बीच तटस्थ रहने की क्षमता की कामना है।
यही पुस्तक के अनुसार निर्विकार जीवन का व्यावहारिक अर्थ है।
निष्कर्ष: बाहरी परिक्रमा से अंतर्मन की परिक्रमा तक
‘परिक्रमा कृपा सार’ को केवल नर्मदा परिक्रमा का यात्रा-वृत्तांत कहना इसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा। यह नर्मदा के माध्यम से व्यक्ति के भीतर बहती चेतना को समझने की कोशिश है।
कृति में नर्मदा तीर्थ से आगे जीवन-पद्धति बनती हैं, पदयात्रा शारीरिक श्रम से आगे समाज को समझने का माध्यम बनती है, कर्म साधना में बदलता है और कृपा पात्रता तथा शुद्ध कर्म से जुड़ती है।
पुस्तक का केंद्रीय संदेश बाहरी परिक्रमा से अंतर्मन की परिक्रमा तक पहुंचता है। नदी की स्वच्छता और मन की स्वच्छता को एक-दूसरे से अलग नहीं माना गया है। दोनों के लिए उद्गम तक पहुंचना आवश्यक है।
अंततः कृति प्राप्ति से अधिक तृप्ति, विजय से अधिक न्याय, जानकारी से अधिक अनुभूति, वाणी से अधिक आचरण और पद से अधिक पात्रता की ओर ध्यान दिलाती है।
नर्मदा की तरह जीवन भी निरंतर प्रवाहमान है। रास्ते में आने वाली शिलाएं दिशा बदल सकती हैं, लेकिन प्रवाह को समाप्त करना जरूरी नहीं। इसी निरंतरता में ‘परिक्रमा कृपा सार’ का दर्शन निहित है।
‘अभी के लिए अल्पविराम’—यही इस कृति का अंतिम संकेत है। यात्रा समाप्त नहीं हुई है। परिक्रमा जारी है और भीतर जागरण की पुकार भी।
नर्मदे हर।
