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2,200 सैनिकों को लेकर US वॉरशिप मिडिल ईस्ट रवाना

aaptak.co.in1@gmail.com March 20, 2026
us marien hormuz strait

वॉशिंगटन। पिछले तीन हफ्तों से, दुनिया का ध्यान एक ही सवाल पर लगा हुआ है, क्या US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ईरान में सैनिक भेजेंगे? हालांकि, ट्रंप इस मामले को काफी सीक्रेट रख रहे हैं, लेकिन सैटेलाइट इमेज ने हलचल मचा दी है।

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रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2,200 सैनिकों को लेकर खतरनाक मरीन से लैस एक नया US वॉरशिप, USS त्रिपोली, मिडिल ईस्ट के लिए रवाना हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि यह जहाज अभी साउथ इंडियन ओशन में इंडिया के बहुत करीब है। एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि अगले हफ़्ते ईरान वॉर एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच सकता है।

गुरुवार को, जब मीडिया ने इस मुद्दे पर ट्रंप को घेरा, तो उन्होंने मजाक में कहा, “मैं कहीं सैनिक नहीं भेज रहा हूं। अगर भेज भी रहा होता, तो भी मैं किसी को नहीं बताता।” ये बातें कितनी सच हैं या गलत, यह तो वक्त ही बताएगा, क्योंकि ट्रंप अपने अचानक लिए गए फैसलों के लिए जाने जाते हैं। US सिक्योरिटी अधिकारियों का तो यह भी कहना है कि ट्रंप ईरान में अपने कैंपेन को और मजबूत करने के लिए हजारों सैनिकों को भेजने पर सीरियसली विचार कर रहे हैं।

अब सवाल यह उठता है कि US अपनी जमीनी सेना क्यों तैनात करना चाहता है? इसके पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला है होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना। दुनिया का 20% तेल और गैस इसी रास्ते से होकर गुजरता है। 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से, ईरान ने इस रास्ते को लगभग ब्लॉक कर दिया है, जिससे दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। ईरान ने भारत और पाकिस्तान जाने वाले कुछ टैंकरों को जाने दिया है, लेकिन उसने पश्चिमी देशों के जहाजों पर हमला करने की धमकी भी दी है। इसके अलावा, अब वह वहां से गुजरने वालों पर बहुत ज्यादा टैक्स लगा रहा है। एक टैंकर ऑपरेटर ने तो यह भी दावा किया है कि उसे सुरक्षित निकलने के लिए लगभग $2 मिलियन देने पड़े।

क्या USS त्रिपोली ट्रंप का सबसे बड़ा हथियार बनेगा?

ट्रंप चाहते हैं कि उनके साथी इस रास्ते की सुरक्षा के लिए जंगी जहाज भेजें, लेकिन अभी तक कोई खास जवाब नहीं आया है। ऐसे में USS त्रिपोली ट्रंप के लिए ट्रंप कार्ड साबित हो सकता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ट्रंप इस तेल रास्ते को सुरक्षित करना चाहते हैं, तो उन्हें ईरानी तट पर सेना तैनात करनी होगी, क्योंकि ईरान की नेवी का एक बड़ा हिस्सा पहले ही तबाह हो चुका है, इसलिए यह US के लिए कम रिस्की ऑपरेशन हो सकता है। कुछ अधिकारियों का मानना ​​है कि ट्रंप इन मरीन का इस्तेमाल ईरान के छोटे द्वीपों पर कब्जा करने के लिए कर सकते हैं ताकि वहां से कमर्शियल जहाज़ों की सुरक्षा हो सके।

एक और बड़ा कारण ईरान का न्यूक्लियर हथियार है। खबर है कि ईरान के पास 950 पाउंड से ज्यादा हाईली एनरिच्ड यूरेनियम है, जिसका इस्तेमाल न्यूक्लियर हथियार बनाने में किया जा सकता है। यह सारा यूरेनियम US और इज़राइल द्वारा बमबारी किए गए बेस के मलबे के नीचे दबा हुआ है। अब, इस खजाने को सुरक्षित रखने के लिए ज़मीनी सैनिकों की जरूरत होगी। ट्रंप शुरू से ही इस बात पर अड़े रहे हैं कि वह ईरान को कभी भी न्यूक्लियर बम बनाने की इजाज़त नहीं देंगे, चाहे वह कोई भी कदम उठाए।

यहां USS त्रिपोली की एंट्री अहम है। इसमें जापान के ओकिनावा में मौजूद 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट के 2,200 सैनिक हैं। CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ये सैनिक जमीन और हवा दोनों तरह की लड़ाई लड़ने में माहिर हैं। यह कोई आम जंगी जहाज़ नहीं है, बल्कि F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट और खतरनाक हेलीकॉप्टर से लैस एक मोबाइल किला है। अगर ट्रंप अगले हफ्ते इन सैनिकों को तैनात करने का फ़ैसला करते हैं, तो यह 20 साल में पहली बार होगा जब US सेना किसी बड़े युद्ध क्षेत्र में जमीन पर होगी।

होर्मुज स्ट्रेट को पार कर 2 तेल टैंकर पहुंचे भारत, जगी उम्मीद

होर्मुज स्ट्रेट

होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक समुद्री जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति की ‘जीवन रेखा’ माना जाता है क्योंकि दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20-25% इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है।

भौगोलिक स्थिति और विशेषताएं

स्थान: इसके उत्तर में ईरान स्थित है और दक्षिण में ओमान (मुसंदम प्रायद्वीप) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) हैं।

लंबाई और चौड़ाई: यह लगभग 167 किमी लंबा है। अपने सबसे संकरे बिंदु पर इसकी चौड़ाई केवल 33 से 39 किमी के बीच है।

शिपिंग लेन: जहाजों के टकराने से बचने के लिए यहां दो लेन बनाई गई हैं (आने और जाने के लिए), जिनमें से प्रत्येक लगभग 3 किमी चौड़ी है और उनके बीच 3 किमी का ‘बफर जोन’ होता है।

रणनीतिक और आर्थिक महत्व

तेल और गैस का परिवहन: सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और कतर जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश अपने निर्यात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं। दुनिया का लगभग 20% तरल प्राकृतिक गैस (LNG) भी यहीं से गुजरता है।

भारत के लिए महत्व: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर अत्यधिक निर्भर है, क्योंकि उसके कच्चे तेल के आयात का लगभग 40-50% हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से आता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था: यहो किसी भी प्रकार की बाधा या तनाव होने पर वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं।

मार्च 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां बढ़ गई हैं। हालिया खबरों के मुताबिक, ईरान ने यहां से गुजरने वाले जहाजों पर टोल (फीस) वसूलना शुरू किया है और सुरक्षा गलियारे (Safe Corridors) बनाने जैसे कदम उठाए हैं।

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