–कृष्णा गौर के संघर्ष से नेतृत्व तक की यात्रा
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!आर.के. यादव

राजनीति में विरासत रास्ता दिखा सकती है, लेकिन उस रास्ते पर चलना खुद पड़ता है। नाम दरवाजा खोल सकता है, लेकिन लोगों के दिलों में जगह काम से ही बनती है। कृष्णा गौर की सार्वजनिक जीवन यात्रा को शायद इसी एक सूत्र में समझा जा सकता है। उनके जीवन में राजनीति भी है, परिवार भी। विरासत भी है, संघर्ष भी। एक ऐसा निजी दुख भी है जिसने जीवन की दिशा बदल दी और ऐसी सार्वजनिक जिम्मेदारियां भी हैं जिन्होंने उन्हें बार बार खुद को साबित करने का अवसर दिया। पति पुरुषोत्तम गौर के असमय निधन के बाद परिवार को संभालने वाली कृष्णा गौर ने आगे चलकर भोपाल की महापौर, गोविंदपुरा की विधायक और मध्य प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार तक का सफर तय किया। यह यात्रा किसी एक दिन शुरू नहीं हुई और न ही केवल किसी राजनीतिक परिवार का हिस्सा होने से पूरी हुई।
इंदौर से शुरू हुआ सफर
26 सितंबर 1968 को इंदौर में जन्मीं कृष्णा गौर की शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को एक व्यापक आधार दिया। उन्होंने विज्ञान में स्नातक और भूगोल में एमए किया। बाद में कानून की पढ़ाई से भी जुड़ीं। मध्य प्रदेश विधानसभा की आधिकारिक प्रोफाइल भी उनकी जन्मतिथि, जन्म स्थान और विज्ञान स्नातक तथा भूगोल में स्नातकोत्तर शिक्षा की पुष्टि करती है। लेकिन किताबों की पढ़ाई के समानांतर एक दूसरी पाठशाला भी चल रही थी, वह थी समाज और सार्वजनिक जीवन की। छात्र जीवन में छात्र संघ और विभिन्न शैक्षणिक, सामाजिक तथा सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रियता ने उन्हें लोगों के बीच काम करने का शुरुआती अनुभव दिया। बाद में विवाह ने उन्हें ऐसे परिवार से जोड़ा जिसकी मध्य प्रदेश की राजनीति में अपनी पहचान थी। उनका विवाह वरिष्ठ राजनेता बाबूलाल गौर के पुत्र पुरुषोत्तम गौर से हुआ। सार्वजनिक जीवन और राजनीति का वातावरण अब उन्हें बहुत निकट से देखने और समझने को मिला। लेकिन जिंदगी की पटकथा केवल उपलब्धियों से नहीं लिखी जाती।
वह मोड़ जिसने जिंदगी बदल दी
वर्ष 2004 कृष्णा गौर के जीवन में एक कठिन मोड़ लेकर आया। उनके पति पुरुषोत्तम गौर का असमय निधन हो गया। सार्वजनिक स्रोतों में भी उनके निधन का उल्लेख मिलता है। उस समय परिवार पर आए इस आघात के बीच कृष्णा गौर ने स्वयं को संभाला और परिवार की जिम्मेदारी उठाई। किसी महिला के जीवन में जीवनसाथी का असमय चले जाना केवल भावनात्मक क्षति नहीं होता। उसके साथ घर, परिवार, बच्चों और भविष्य से जुड़ी अनेक जिम्मेदारियां अचानक नए रूप में सामने खड़ी हो जाती हैं। कृष्णा गौर के लिए भी यह ऐसा ही समय रहा होगा, जब निजी दुख के बीच जीवन को फिर से व्यवस्थित करना था। यहीं से उनके जीवन को देखने का नजरिया भी बदलता है। वे केवल एक बड़े राजनीतिक परिवार की बहू नहीं रहीं। उन्हें अपने जीवन की अगली राह स्वयं बनानी थी।पुरुषोत्तम गौर की स्मृतियां उनके निजी जीवन की विरासत थीं और बाबूलाल गौर का लंबा राजनीतिक जीवन उनके सामने सार्वजनिक सेवा का एक बड़ा उदाहरण। लेकिन किसी की विरासत को संभालने और अपनी पहचान बनाने के बीच एक लंबी दूरी होती है। कृष्णा गौर ने यह दूरी धीरे धीरे तय की।
दुख से बाहर निकलने का रास्ता बना सार्वजनिक जीवन
पति के निधन के बाद कृष्णा गौर ने खुद को केवल परिवार तक सीमित नहीं किया। वे सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में और सक्रिय हुई। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने, महिला उत्पीडऩ के खिलाफ आवाज उठाने और स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता से जुड़े काम उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बने। सेवा भारती, लायंस क्लब और अन्य सामाजिक संस्थाओं से जुड़ाव ने उन्हें समाज के उस हिस्से तक पहुंचाया जहां राजनीति भाषण से नहीं, छोटी छोटी जरूरतों और समस्याओं के समाधान से पहचानी जाती है। शायद यही वह दौर था जिसमें एक राजनीतिक परिवार की सदस्य से अलग कृष्णा गौर की अपनी सार्वजनिक पहचान आकार लेने लगी। वर्ष 2005 में उन्हें मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम की अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद भाजपा संगठन और महिला मोर्चा में भी उन्होंने विभिन्न दायित्व संभाले।
राजनीति में महिला होना अपने आप में कई अतिरिक्त कसौटियां लेकर आता है। पुरुष नेता की दृढ़ता नेतृत्व मानी जाती है, लेकिन कई बार उसी दृढ़ता के लिए महिला नेता को अलग नजर से देखा जाता है। घर और सार्वजनिक जीवन के बीच संतुलन की अपेक्षा भी महिला से अधिक की जाती है। कृष्णा गौर का राजनीतिक सफर इन परिस्थितियों के बीच आगे बढ़ा।
भोपाल ने सौंपी शहर की कमान
वर्ष 2009 में उनके सार्वजनिक जीवन ने बड़ी छलांग लगाई। वे भोपाल की महापौर चुनी गई। यह पद केवल राजनीतिक प्रतिष्ठा का नहीं था। राजधानी भोपाल उस समय तेजी से फैल रहा था। पानी, यातायात, सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छता और शहरी अधोसंरचना की चुनौतियां सामने थीं। ऐसे शहर का नेतृत्व किसी भी जनप्रतिनिधि की प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा होता है। महापौर के पांच वर्षों में कृष्णा गौर के नाम से कई महत्वपूर्ण शहरी परियोजनाएं जुड़ीं। नर्मदा जल परियोजना उनमें सबसे प्रमुख रही। तेजी से बढ़ते शहर के लिए पेयजल की स्थायी व्यवस्था एक बड़ी आवश्यकता थी। इसी दौर में हबीबगंज रेलवे ओवरब्रिज, कमला पार्क के केबल स्टे ब्रिज, सुल्तानिया रोड और स्टेट बैंक क्षेत्र से जुड़े यातायात सुधार के काम आगे बढ़े। बीआरटीएस कारिडोर और लो फ्लोर बसों ने भोपाल के सार्वजनिक परिवहन की तस्वीर बदलने की कोशिश की। घर घर कचरा संग्रह की शुरुआत और महिलाओं के लिए अलग बस संचालन जैसी पहलें भी इसी दौर से जुड़ीं। महापौर का कार्यकाल कृष्णा गौर के लिए इसलिए महत्वपूर्ण था कि अब उनकी पहचान किसी और के नाम से नहीं, उनके प्रशासनिक काम से होने लगी थी।
विरासत की सबसे कठिन परीक्षा फिर आया वर्ष 2018
गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र दशकों से बाबूलाल गौर की राजनीतिक पहचान का केंद्र था। वे यहां से लगातार चुनाव जीतते रहे थे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे थे। अब उसी क्षेत्र से कृष्णा गौर को चुनाव लडऩा था। यहां विरासत सुविधा भी थी और चुनौती भी। जहां मतदाताओं के बीच ‘गौर’ नाम परिचित था, वहीं कृष्णा गौर के सामने यह साबित करने की चुनौती थी कि वे केवल किसी विरासत की प्रतिनिधि नहीं, स्वयं जनप्रतिनिधि बनने की क्षमता रखती हैं। उन्होंने 2018 का विधानसभा चुनाव 46 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीता। इसी जीत के साथ वे भोपाल से विधायक चुनी जाने वाली पहली महिला भी बनीं। यह जीत एक राजनीतिक सीट का हस्तांतरण भर नहीं थी। यह उस महिला की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान की शुरुआत थी जिसने पहले नगर सरकार चलाई थी और अब राज्य की विधायिका में पहुंची थी। विधानसभा में भी उनकी सक्रियता उल्लेखनीय रही। पीआरएस के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2018 से जुलाई 2023 के बीच उनकी विधानसभा उपस्थिति 87.3 प्रतिशत रही और उन्होंने 153 प्रश्न किए।
दीदी बनकर बना जनता से रिश्ता
राजनीति में बड़े भाषणों से ज्यादा टिकाऊ वह रिश्ता होता है जिसमें मतदाता अपने प्रतिनिधि को सहजता से पुकार सके। गोविंदपुरा में कृष्णा गौर की ऐसी ही पहचान ‘दीदी’ के रूप में बनी। खास तौर पर महिलाओं और युवाओं के बीच इस संबोधन और उनके सीधे संपर्क का उल्लेख सार्वजनिक विवरणों में भी मिलता है। यह संबोधन राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मंत्रीजी या विधायकजी पद बताते हैं, लेकिन दीदी रिश्ता बताता है। महिलाओं के बीच उनकी स्वीकार्यता को उनके लंबे सामाजिक जुड़ाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता। महिला सशक्तीकरण उनके लिए केवल राजनीतिक कार्यक्रम का विषय नहीं रहा। महिलाओं की आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और सामाजिक भागीदारी के सवालों से उनका जुड़ाव सार्वजनिक जीवन के शुरुआती दौर से रहा है। उनकी अपनी जीवन यात्रा भी महिलाओं को एक अलग संदेश देती है। निजी संकट आने के बाद सार्वजनिक जीवन से पीछे हटने के बजाय उन्होंने अपनी भूमिका का विस्तार किया।
2023 ने पहचान पर लगाई बड़ी मुहर
अगर 2018 की जीत को विरासत और स्वयं की पहचान के बीच परीक्षा माना जाए, तो 2023 का चुनाव उसका कहीं अधिक स्पष्ट उत्तर था। कृष्णा गौर ने गोविंदपुरा से 1 लाख 6 हजार 668 मतों के विशाल अंतर से जीत दर्ज की। इतना बड़ा जनादेश केवल किसी पारिवारिक राजनीतिक विरासत से समझाना आसान नहीं है। राजनीति में विरासत पहली सीढ़ी दे सकती है, लेकिन बार बार मतदाता का भरोसा हासिल करने के लिए अपना संपर्क, अपना काम और अपनी स्वीकार्यता जरूरी होती है। 25 दिसंबर 2023 को उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के रूप में शपथ ली। उन्हें पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण तथा विमुक्त, घुमंतू और अर्धघुमंतू कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली।
महिला नेतृत्व का एक अलग चेहरा
कृष्णा गौर की कहानी को केवल उनकी चुनावी सफलताओं से देखना अधूरा होगा। इसमें महिला नेतृत्व के विकास की कहानी भी छिपी है। एक महिला जो पत्नी और मां की पारिवारिक भूमिकाओं के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुई। जिसने पति को असमय खोने का दुख झेला। जिसने एक बड़े राजनीतिक परिवार की विरासत को देखा, लेकिन उसी की छाया में बने रहने के बजाय नगर राजनीति से अपनी स्वतंत्र यात्रा शुरू की। जिसने राजधानी की महापौर के रूप में प्रशासन संभाला, विधानसभा पहुंची और फिर मंत्री बनी। उनकी कहानी यह भी बताती है कि महिला नेतृत्व केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों तक सीमित नहीं है। एक महिला नेता पेयजल परियोजना, पुल, सार्वजनिक परिवहन, नगर प्रशासन और अधोसंरचना भी उतनी ही मजबूती से संभाल सकती है जितनी महिला कल्याण या सामाजिक न्याय की जिम्मेदारी। यही महिला नेतृत्व के बदलते स्वरूप की वास्तविक तस्वीर है। विरासत को आगे ले जाना ही नहीं, उसमें अपना अध्याय जोडऩा कृष्णा गौर के नाम के साथ गौर परिवार की राजनीतिक विरासत स्वाभाविक रूप से जुड़ी रहेगी। पुरुषोत्तम गौर उनके निजी जीवन की स्मृति हैं और बाबूलाल गौर मध्य प्रदेश की राजनीति की एक बड़ी विरासत। लेकिन कृष्णा गौर की अब तक की यात्रा का महत्व इस बात में है कि उन्होंने उस विरासत को केवल संभाला नहीं, उसमें अपना अध्याय जोड़ा।
भोपाल की महापौर होना उनका अपना अध्याय था। 2018 में विधायक बनना उनका अपना अध्याय था। 2023 में एक लाख से अधिक मतों के अंतर से दोबारा जीतना उनका अपना अध्याय था। और राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के रूप में सरकार का हिस्सा बनना भी उसी यात्रा का अगला अध्याय है। राजनीतिक जीवन में आखिरकार हर व्यक्ति को अपने नाम से पहचाने जाने की परीक्षा देनी पड़ती है। कृष्णा गौर ने भी यह परीक्षा दी है और यह यात्रा अभी जारी है। कभी जिंदगी ने उनसे बहुत कुछ अचानक छीन लिया था। लेकिन उन्होंने उसी मोड़ को ठहर जाने की वजह नहीं बनने दिया। परिवार संभाला, खुद को संभाला और सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ती रहीं। इसीलिए कृष्णा गौर की कहानी केवल राजनीति की कहानी नहीं है। यह विरासत से पहचान तक की कहानी है। निजी दुख से सार्वजनिक दायित्व तक की कहानी है। और सबसे बढक़र, यह उस महिला की कहानी है जिसने परिस्थितियों से मिली भूमिका को स्वीकार भर नहीं किया, बल्कि धीरे धीरे उसे अपने व्यक्तित्व और अपने काम की पहचान में बदल दिया।
(लेखक: सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
