-वैज्ञानिकों ने बनाया ‘सुपर HGF’, रिसेप्टर से दोगुने से ज्यादा मजबूती से जुड़ा प्रोटीन
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!नई दिल्ली। बढ़ती उम्र के साथ कमजोर होती मांसपेशियों को लेकर वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है, जो भविष्य में बुजुर्गों की शारीरिक ताकत और गतिशीलता बनाए रखने में मदद कर सकती है। जापान की क्यूशू यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक सल्फर-आधारित यौगिक की पहचान की है, जो शरीर में मांसपेशियों की मरम्मत करने वाले प्राकृतिक प्रोटीन को अधिक प्रभावी बना सकता है।
शोधकर्ताओं ने इस अधिक प्रभावी प्रोटीन को ‘सुपर HGF’ नाम दिया है। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में इस प्रोटीन की मांसपेशियों की स्टेम सेल्स के रिसेप्टर से जुड़ने की क्षमता सामान्य HGF प्रोटीन की तुलना में दोगुने से अधिक पाई गई। शुरुआती पशु प्रयोगों में भी इसके सकारात्मक संकेत मिले हैं।
यह खोज उम्र के साथ होने वाली मांसपेशियों की कमजोरी, मांसपेशियों के क्षरण और चोट के बाद धीमी रिकवरी के लिए नए उपचार विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, अभी यह शोध शुरुआती चरण में है और मनुष्यों में इसकी प्रभावशीलता की पुष्टि नहीं हुई है।
उम्र बढ़ने पर मांसपेशियों की मरम्मत क्यों धीमी हो जाती है?
मांसपेशियां शरीर को चलने, उठने-बैठने, वजन उठाने और संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं। उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की ताकत और आकार में कमी आने लगती है। मांसपेशियों के भीतर वसा और निशाननुमा ऊतक (Scar Tissue) जमा हो सकते हैं। इससे शारीरिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में सार्कोपीनिया (Sarcopenia) कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को चलने, सीढ़ियां चढ़ने और रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है।
मांसपेशियों की मरम्मत के लिए शरीर में सैटेलाइट सेल्स (Satellite Cells) नाम की विशेष स्टेम सेल्स मौजूद होती हैं। ये सामान्य परिस्थितियों में निष्क्रिय रहती हैं, लेकिन चोट या मांसपेशियों को नुकसान पहुंचने पर सक्रिय हो जाती हैं।
इन कोशिकाओं को सक्रिय करने में HGF प्रोटीन की अहम भूमिका होती है। उम्र बढ़ने के साथ इस प्रोटीन की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे मांसपेशियों की मरम्मत की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।
क्या है HGF प्रोटीन और कैसे करता है काम?
HGF का पूरा नाम हेपेटोसाइट ग्रोथ फैक्टर (Hepatocyte Growth Factor) है। यह शरीर में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण प्रोटीन है, जो मांसपेशियों की मरम्मत सहित कई जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है।
मांसपेशियों में HGF प्रोटीन एक तरह के संकेत की तरह काम करता है। जब मांसपेशियों को चोट लगती है या उन पर यांत्रिक दबाव पड़ता है, तब यह प्रोटीन सक्रिय होकर सैटेलाइट सेल्स की सतह पर मौजूद c-Met रिसेप्टर से जुड़ता है।
इसके बाद सैटेलाइट सेल्स सक्रिय होती हैं और विभाजित होकर क्षतिग्रस्त मांसपेशियों की मरम्मत में योगदान देती हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ HGF प्रोटीन में कुछ रासायनिक बदलाव होने लगते हैं। इससे वह अपने रिसेप्टर से प्रभावी ढंग से जुड़ नहीं पाता और मांसपेशियों की मरम्मत का संकेत कमजोर हो जाता है।
वैज्ञानिकों ने खोजा मांसपेशियों की कमजोरी का एक कारण
क्यूशू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रयूइची तात्सुमी के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने HGF प्रोटीन में होने वाले एक रासायनिक बदलाव का अध्ययन किया। इस बदलाव को नाइट्रेशन (Nitration) कहा जाता है। इसमें प्रोटीन के कुछ विशेष हिस्सों में नाइट्रो समूह जुड़ जाता है, जिससे उसकी संरचना और कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
शोधकर्ताओं ने HGF प्रोटीन के दो महत्वपूर्ण स्थानों Y198 और Y250 का अध्ययन किया। इन स्थानों पर नाइट्रेशन होने से HGF की c-Met रिसेप्टर से जुड़ने की क्षमता कम हो जाती है। इससे मांसपेशियों की मरम्मत करने वाली स्टेम सेल्स को पर्याप्त संकेत नहीं मिल पाता।
वैज्ञानिकों के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ HGF की मात्रा कम होना ही समस्या नहीं है, बल्कि शरीर में मौजूद HGF प्रोटीन का रासायनिक रूप से कमजोर हो जाना भी मांसपेशियों की मरम्मत क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
दो सल्फर यौगिकों पर किया गया प्रयोग
शोधकर्ताओं ने HGF प्रोटीन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए दो सल्फर-आधारित यौगिकों का परीक्षण किया।
- ग्लूटाथियोन ट्राइसल्फाइड (GSSSG)
- लिपोइक एसिड ट्राइसल्फाइड (LASSS)
दोनों यौगिक एंटीऑक्सिडेंट गुणों के लिए जाने जाते हैं। शुरुआती प्रयोगों में दोनों ने HGF प्रोटीन के नाइट्रेशन को कम करने में मदद की। हालांकि, केवल नाइट्रेशन कम करने से HGF की रिसेप्टर से जुड़ने की क्षमता पूरी तरह बहाल नहीं हुई। इसके बाद वैज्ञानिकों ने HGF और इन यौगिकों के अनुपात में बदलाव किया। प्रयोग के दौरान LASSS के साथ एक अप्रत्याशित परिणाम सामने आया।
LASSS ने HGF को बनाया ‘सुपर HGF’
वैज्ञानिकों ने पाया कि LASSS के साथ उपचार के बाद HGF प्रोटीन की c-Met रिसेप्टर से जुड़ने की क्षमता सामान्य HGF की तुलना में दोगुने से अधिक हो गई। यह प्रभाव दूसरे यौगिक GSSSG के साथ नहीं देखा गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, LASSS केवल HGF को रासायनिक नुकसान से बचाने का काम नहीं करता, बल्कि संभवतः प्रोटीन की संरचना में भी सूक्ष्म बदलाव करता है।
इस बदलाव के कारण HGF प्रोटीन रिसेप्टर से अधिक मजबूती से जुड़ सकता है और नाइट्रेशन के कारण होने वाली कार्यक्षमता की कमी के प्रति अधिक प्रतिरोधी बन सकता है। इसी अधिक प्रभावी स्वरूप को वैज्ञानिकों ने ‘सुपर HGF’ नाम दिया है।
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि शरीर में पहले से मौजूद मांसपेशियों की मरम्मत प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
चूहों पर भी किया गया परीक्षण
प्रयोगशाला में मिले परिणामों के बाद वैज्ञानिकों ने जीवित शरीर में LASSS के प्रभाव का अध्ययन किया। इसके लिए चूहों में टेल-सस्पेंशन (Tail Suspension) मॉडल का इस्तेमाल किया गया। इस मॉडल में चूहों के पिछले पैरों की मांसपेशियों पर भार कम हो जाता है, जिससे मांसपेशियों के क्षरण का अध्ययन किया जा सकता है।
परीक्षण में LASSS दिए गए चूहों में HGF प्रोटीन के नाइट्रेशन का स्तर बिना उपचार वाले चूहों की तुलना में कम पाया गया। इसके विपरीत, GSSSG के साथ ऐसा प्रभाव नहीं देखा गया। इससे संकेत मिला कि LASSS का प्रभाव केवल प्रयोगशाला में ही नहीं, बल्कि जीवित शरीर में भी दिखाई दे सकता है।
हालांकि, यह परीक्षण उम्रदराज चूहों में मांसपेशियों की मरम्मत को पूरी तरह बहाल करने का प्रमाण नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिकों को आगे उम्रदराज जानवरों पर विस्तृत अध्ययन करना होगा।
बुजुर्गों के लिए क्या हो सकता है इसका फायदा?
उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की कमजोरी व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। कई बुजुर्गों को चलने, सीढ़ियां चढ़ने, गिरने के बाद संभलने और सामान्य गतिविधियां करने में परेशानी होती है। यदि भविष्य में LASSS के प्रभावों की पुष्टि मनुष्यों में होती है, तो यह मांसपेशियों की मरम्मत को बेहतर बनाने के लिए नई उपचार पद्धति विकसित करने में मदद कर सकता है।
इसके संभावित उपयोग में शामिल हो सकते हैं
- उम्र के साथ मांसपेशियों की ताकत बनाए रखने में मदद।
- लंबे समय तक बिस्तर पर रहने से होने वाले मांसपेशी क्षरण को कम करने की संभावनाएं।
- चोट के बाद मांसपेशियों की रिकवरी को बेहतर बनाने के नए तरीके।
- बुजुर्गों में शारीरिक गतिशीलता और स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए उपचार विकसित करना।
- मांसपेशियों की कमजोरी से जुड़ी स्थितियों के लिए नए चिकित्सकीय विकल्प तलाशना।
- वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रक्रिया का अध्ययन मनुष्यों के साथ-साथ पालतू जानवरों में भी भविष्य के उपचारों के लिए उपयोगी हो सकता है।
क्या ‘सुपर HGF’ की दवा जल्द बाजार में आएगी?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। यह शोध अभी शुरुआती वैज्ञानिक चरण में है। LASSS की सुरक्षा, उचित खुराक, शरीर में उसके प्रभाव और लंबे समय तक इस्तेमाल के परिणामों का अध्ययन किया जाना बाकी है।
मनुष्यों में क्लिनिकल ट्रायल के बिना यह नहीं कहा जा सकता कि LASSS बढ़ती उम्र में मांसपेशियों की कमजोरी को रोक सकता है या उनका क्षरण पूरी तरह ठीक कर सकता है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि LASSS को दवा, इंजेक्शन या किसी अन्य उपचार के रूप में विकसित किया जा सकेगा या नहीं। इसलिए फिलहाल इसे कोई प्रमाणित दवा या सप्लीमेंट नहीं माना जाना चाहिए।
