नई दिल्ली। सोने की शानदार और लंबे समय तक चलने वाली चमक के लिए हमेशा से इसकी बहुत अहमियत रही है। अब, ट्यूलेन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने एक अहम वजह का पता लगाया है कि यह कीमती धातु काली क्यों नहीं पड़ती। उनकी रिसर्च से पता चलता है कि सोने की मजबूती सिर्फ उसकी केमिस्ट्री से तय नहीं होती। बल्कि, इसकी सतह पर मौजूद एटम (परमाणु) का अरेंजमेंट भी इसमें अहम भूमिका निभाता है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!फिजिकल रिव्यू लेटर्स में छपी इस स्टडी में पाया गया कि सोने की कुछ खास सतहों पर एटम अपने-आप ऐसे सुरक्षात्मक पैटर्न में बदल जाते हैं, जिससे ऑक्सीजन का उस धातु के साथ रिएक्शन करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इस नई जानकारी से यह समझने में मदद मिलती है कि सोने के गहने, सिक्के और दूसरी चीज़ें सदियों तक अपनी चमक क्यों बनाए रख सकती हैं। इससे वैज्ञानिकों को इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग और क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के लिए सोने पर आधारित ज्यादा असरदार कैटलिस्ट बनाने में भी मदद मिल सकती है।
केमिकल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रो. मैथ्यू मोंटेमोर ने कहा, लोग आमतौर पर सोचते थे कि सोना इसलिए काला नहीं पड़ता, क्योंकि यह ऑक्सीजन के साथ मजबूती से रिएक्ट नहीं करता है। हमने जो दिखाया है वह यह है कि सोने की दो सबसे आम सतहों के लिए, सतह के एटम असल में खुद को इस तरह से री-अरेंज करते हैं कि सोना ऑक्सीडेशन के प्रति कहीं ज्यादा रेजिस्टेंट (प्रतिरोधी) हो जाता है। इस प्रोसेस की जांच करने के लिए, मोंटेमोर और उनके साथी लेखक सांतू बिस्वास (जो ट्यूलेन के केमिकल और बायोमॉलिक्यूलर इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में पोस्ट डॉक्टरल फेलो हैं) ने कंप्यूटर सिमुलेशन का इस्तेमाल करके यह मॉडल बनाया कि एटम और इलेक्ट्रॉन कैसे व्यवहार करते हैं। उन्होंने देखा कि ऑक्सीजन के मॉलिक्यूल सोने की दो आम सतहों के साथ कैसे रिएक्ट करते हैं।
सिमुलेशन से पता चला कि अगर सतह के एटम खुद को री-अरेंज नहीं करते, तो ऑक्सीजन के मॉलिक्यूल बहुत आसानी से अलग हो सकते थे और सोने के साथ रिएक्ट कर सकते थे। इसके बजाय, एटॉमिक रीस्ट्रक्चरिंग उन रिएक्शन्स को बहुत हद तक कम कर देती है। रिसर्चर्स के अनुसार, ये री-ऑर्गनाइज्ड सतहें ऑक्सीजन रिएक्शन्स को एक अरब से एक खरब गुना तक कम कर देती हैं। असल में, वे एटॉमिक लेवल पर एक सुरक्षात्मक परत बनाती हैं जो सोने को लगभग हमेशा चमकदार बनाए रखती है।
इस खोज का क्या मतलब है
सोने की सबसे जानी-पहचानी खूबियों में से एक को समझाने के अलावा, इस रिसर्च के कैटालिसिस (उत्प्रेरण) के लिए भी अहम नतीजे हो सकते हैं। सोने पर आधारित कैटलिस्ट, जो केमिकल रिएक्शन्स की गति को बढ़ाते हैं, पहले से ही कई इंडस्ट्रियल ऑक्सीडेशन प्रोसेस में इस्तेमाल किए जाते हैं। हालांकि, वही खूबी जो सोने को ऑक्सीजन के प्रति बहुत ज्यादा रेजिस्टेंट बनाती है और इसे गहनों और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए आदर्श बनाती है।
कुछ केमिकल मैन्युफैक्चरिंग और एनर्जी से जुड़े रिएक्शन्स के लिए इसकी असरदारता को भी कम कर देती है। उदाहरण के लिए, गोल्ड पैलेडियम कैटलिस्ट का इस्तेमाल विनाइल एसीटेट बनाने में किया जाता है, जो कई प्लास्टिक और दूसरे प्रोडक्ट्स में एक ज़रूरी चीज़ है। वैज्ञानिक गोल्ड कैटलिस्ट का इस्तेमाल गाडिय़ों के धुएं से कार्बन मोनोऑक्साइड हटाने और प्रोपलीन ऑक्साइड (एक और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाला इंडस्ट्रियल केमिकल) बनाने जैसे कामों के लिए भी कर रहे हैं।
मोंटेमोर ने कहा, अगर आप गोल्ड से ऑक्सीजन को अलग करवा सकें, तो यह असल में कुछ खास रिएक्शन के लिए बहुत असरदार कैटलिस्ट बन सकता है। हमारा काम एक नई स्ट्रेटेजी बताता है, जिससे सतह पर होने वाले इन बदलावों को रोककर या उलटकर ऐसा किया जा सकता है।
बेहतर कैटलिस्ट के लिए एक नई स्ट्रेटेजी
अब तक, गोल्ड कैटलिस्ट को बेहतर बनाने की कोशिशें ज्यादातर गोल्ड को दूसरी धातुओं के साथ मिलाने या ऑक्साइड की सतह पर बहुत छोटे गोल्ड नैनोपार्टिकल्स का इस्तेमाल करने पर केंद्रित रही हैं। नई खोजों से पता चलता है कि आगे बढऩे का एक और रास्ता हो सकता है। गोल्ड की सतह की बनावट और उसके एटम जिस तरह से व्यवस्थित होते हैं, उसे कंट्रोल करके रिसर्चर इस धातु की कैटलिस्ट के तौर पर काम करने की क्षमता को बेहतर बना सकते हैं। साथ ही, वे इस बात की गहरी समझ भी हासिल कर सकते हैं कि इतिहास में गोल्ड पर कभी जंग क्यों नहीं लगा।
