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भारतीय राजनीति में दल-बदल का ‘दलदल’

aaptak.co.in1@gmail.com June 14, 2026
Defections in the country indian politics
  • आर.बी. सिंह

भारत में हाल के वर्षों में दल-बदल की राजनीति केवल राष्ट्रीय दलों तक सीमित नहीं रही है। क्षेत्रीय दल भी इससे अछूते नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में कई नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) छोड़कर अन्य दलों का रुख किया, वहीं कुछ नेता अन्य दलों से टीएमसी में शामिल हुए। इसी प्रकार आम आदमी पार्टी (आप) में भी कई प्रमुख नेताओं के इस्तीफे और दल परिवर्तन की घटनाएं सामने आई हैं।

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इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या राजनीतिक दलों में वैचारिक प्रतिबद्धता कमजोर पड़ रही है और व्यक्तिगत राजनीतिक हित अधिक प्रभावी हो रहे हैं। जब नेता चुनाव के समय एक विचारधारा और मंच के नाम पर जनता से समर्थन प्राप्त करते हैं, लेकिन बाद में राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार दल बदल लेते हैं, तो इससे मतदाताओं का विश्वास प्रभावित होता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था की साख पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं।

यह उदाहरण दर्शाते हैं कि दल-बदल की समस्या किसी एक दल या राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति की व्यापक चुनौती बन चुकी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है,लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश की राजनीति में दल-बदल की बढ़ती प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन गई है।

भारत में दल-बदल की समस्या कोई नई नहीं है। दल-बदल का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन 1960, 1970 के दशक में विकराल रूप धारण कर लिया। 1967 के चौथे आम चुनाव को राजनीतिक के इतिहास में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जाता है। इस चुनाव में केंद्र में कांग्रेस का दबदबा तो कायम रहा, लेकिन कई राज्यों में पकड़ कमजोर हो गई। राज्यों में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, जिसने अवसरवादी राजनीति को जन्म दिया।

वर्ष 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने मात्र 15 दिनों के भीतर तीन बार पार्टी बदली। उन्होंने पहले कांग्रेस छोड़ी, फिर यूनाइटेड फ्रंट में गए, दोबारा कांग्रेस में आए और नौ घंटे के भीतर फिर से यूनाइटेड फ्रंट में चले गए। इस घटना के बाद राजनीतिक अवसरवाद को दर्शाने के लिए ‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा बेहद लोकप्रिय हो गया। और यह दल-बदल की राजनीति का प्रतीक बन गया था।

इस राजनीतिक अस्थिरता को रोकने 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को दल-बदल से रोकना था। हालांकि, समय के साथ नेताओं ने कानून की खामियों का लाभ उठाकर नए तरीके खोज लिए और दल-बदल की घटनाएं जारी रहीं।

1985 के कानून की कमियों को दूर करने के लिए 2003 में 91वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू किया गया। इस कानून के तहत कोई भी सांसद या विधायक अपनी सदस्यता खो सकता है यदि वह स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह चुना गया था। यदि वह सदन में अपनी पार्टी के निर्देशों (व्हिप) के विपरीत मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, और 15 दिनों के भीतर पार्टी उसे माफ नहीं करती। यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है। यदि कोई नामित सदस्य अपनी नियुक्ति के 6 महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।

शुरुआत में (1985 में) प्रावधान था कि यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई (1/3) सदस्य अलग होते हैं, तो उसे दल-बदल नहीं माना जाएगा। लेकिन इसका दुरुपयोग सामूहिक दल-बदल के लिए होने लगा। अत: 2003 के 91वें संशोधन द्वारा इस नियम को बदल दिया गया। अब नए नियमों के अनुसार यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी अन्य दल में विलय करने का फैसला करते हैं, तो उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होगी। यद्यपि दलबदल विरोधी कानून राजनीतिक स्थिरता लाने के उद्देश्य से बनाया गया था, लेकिन समय के साथ इसके भीतर कई गंभीर खामियां और विसंगतियां सामने आ गईं।

भारतीय राजनीति में कोई भी जनप्रतिनिधि वैचारिक मतभेदों के कारण कम और व्यक्तिगत लाभ के लिए अधिक दल-बदल करता है। दल-बदल का सबसे बड़ा कारण सत्ता की भूख है। विपक्ष के विधायक या सांसद अक्सर सत्ताधारी दल में केवल इसलिए शामिल हो जाते हैं, ताकि उन्हें कैबिनेट में मंत्री पद या कोई अन्य महत्वपूर्ण सरकारी पद मिल सके। समकालीन राजनीति में ‘हॉर्स ट्रेडिंगÓ यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त एक आम बात बन चुकी है। बड़े-बड़े उद्योगपतियों और राजनीतिक दलों द्वारा विपक्षी विधायकों को करोड़ों रुपए के वित्तीय प्रलोभन दिए जाते हैं।

आधुनिक भारतीय राजनीति में विचारधारा का महत्व लगातार कम हो रहा है। राजनीतिक दल और नेता अपनी सुविधानुसार दक्षिणपंथी, वामपंथी या मध्यमार्गी विचारधाराओं के बीच स्विच कर लेते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य चुनाव जीतना और सत्ता में बने रहना होता है। चुनावों के समय जब किसी स्थापित नेता को उसकी मौजूदा पार्टी से चुनाव लडऩे का टिकट नहीं मिलता, तो वह तत्काल दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है। वहीं कई बार पार्टियों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमी होती है। केंद्रीय नेतृत्व द्वारा स्थानीय नेताओं की उपेक्षा की जाती है, जिससे तंग आकर वे बगावत कर देते हैं।

इस कानून के तहत किसी सदस्य को अयोग्य घोषित करने का अंतिम अधिकार सदन के अध्यक्ष (स्पीकर) को होता है। चूंकि स्पीकर आमतौर पर सत्ताधारी दल का ही कोई नेता होता है, इसलिए उनकी भूमिका अक्सर निष्पक्ष नहीं होती। वे सत्ताधारी दल के विधायकों के दलबदल के मामलों को महीनों या सालों तक लटकाए रखते हैं, जबकि विपक्षी विधायकों पर तुरंत कार्रवाई करते हैं।

यह कानून व्यक्तिगत दल-बदल को तो रोकता है, लेकिन ‘सामूहिक दल-बदल’ को वैध बनाता है। दो-तिहाई सदस्यों के विलय की छूट के कारण हाल के वर्षों में पूरी की पूरी राज्य इकाइयां ही एक दल से दूसरे दल में शामिल हो गई हैं (जैसे गोवा, मप्र, कर्नाटक, महाराष्ट्र, दिल्ली सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में देखा गया)।

इस कानून के कारण सांसद या विधायक संसद में अपनी अंतरात्मा की आवाज पर या अपने क्षेत्र की जनता के हित में स्वतंत्र रूप से राय नहीं रख पाते। उन्हें हर हाल में अपनी पार्टी के व्हिप का पालन करना पड़ता है, भले ही वे पार्टी की नीति से असहमत हों। इससे विधायी बहस का महत्व कम हो गया है।

आजकल नेताओं ने कानून से बचने का एक नया तरीका खोज लिया है। वे दल-बदल करने के बजाय विधानसभा या लोकसभा की सदस्यता से ही इस्तीफा दे देते हैं। इससे सदन में बहुमत का आंकड़ा गिर जाता है और विपक्षी सरकार गिर जाती है। बाद में, वही नेता सत्तारूढ़ दल के टिकट पर उपचुनाव लड़कर दोबारा सदन में पहुंच जाते हैं।

दल-बदल केवल सरकारों के गिरने या बनने तक सीमित नहीं है, इसके भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे पर बेहद विनाशकारी प्रभाव पड़ते हैं। लोकतंत्र में जनता किसी उम्मीदवार को एक निश्चित विचारधारा और पार्टी के प्रतीक चिह्न को देखकर वोट देती है। जब वह प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदल लेता है, तो यह सीधे तौर पर मतदाताओं के भरोसे और जनादेश के साथ धोखा होता है।

दल-बदल की राजनीति ने देश में काले धन के उपयोग को अत्यधिक बढ़ा दिया है। रिसॉर्ट पॉलिटिक्स (विधायकों को होटलों या रिसॉर्ट्स में छिपाकर रखना) भारतीय लोकतंत्र की एक शर्मनाक तस्वीर बन चुकी है। जब आम नागरिक अपने नेताओं को सरेआम बिकते और निष्ठा बदलते देखते हैं, तो उनका लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्यायपालिका और पूरी राजनीतिक प्रक्रिया से विश्वास उठने लगता है।

दलबदल विरोधी कानून को प्रासंगिक और प्रभावी बनाए रखने के लिए इसमें व्यापक सुधारों की आवश्यकता है। इस संबंध में विभिन्न विधि आयोगों, चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई सुझाव दिए गए हैं। दिनेश गोस्वामी समिति और विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि दलबदल से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार राष्ट्रपति या राज्यपाल को होना चाहिए, जो इस संबंध में केंद्रीय चुनाव आयोग की अनिवार्य सलाह पर काम करें। इससे स्पीकर का पक्षपात समाप्त होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में कहा है कि स्पीकर को दल-बदल की याचिकाओं पर एक निश्चित समय सीमा (जैसे 3 महीने) के भीतर निर्णय लेना चाहिए। ‘व्हिप’ जारी करने की शक्ति केवल उन्हीं मामलों तक सीमित होनी चाहिए, जहां सरकार के अस्तित्व को खतरा हो, जैसे अविश्वास प्रस्ताव या बजट सत्र। सामान्य विधेयकों पर सांसदों और विधायकों को अपनी स्वतंत्रता होनी चाहिए।

यदि कोई सदस्य दल-बदल करता है या इस्तीफा देकर सरकार गिराता है, तो उसे उस विधानसभा या लोकसभा के शेष कार्यकाल के लिए कोई भी लाभ का पद (मंत्री पद) लेने या दोबारा चुनाव लडऩे से कम से कम 5 वर्षों के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए।

भारतीय राजनीति में दल-बदल एक ऐसा नासूर बन चुका है, जो लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है। यद्यपि 1985 का दलबदल विरोधी कानून एक सराहनीय प्रयास था, लेकिन इसके छिद्रों का इस्तेमाल करके नेताओं ने अनैतिक राजनीति के नए रास्ते निकाल लिए हैं।

केवल कड़े कानून बना देने से इस समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। इसके लिए राजनीतिक दलों में नैतिक सुधार, जनप्रतिनिधियों में शुचिता और सबसे महत्वपूर्ण बात-मतदाताओं की जागरूकता आवश्यक है। जब तक देश की जनता अवसरवादी और दल-बदल करने वाले नेताओं को चुनाव में नकारना शुरू नहीं करेगी, तब तक भारतीय राजनीति से ‘आया राम, गया राम’ की इस विकृत संस्कृति को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता के विवेक में ही निहित है।


(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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