विवेक त्रिपाठी
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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। यदि इस इस्तीफे को केवल एक मंत्री के पद छोड़ने तक सीमित समझा जाए, तो यह अधूरा विश्लेषण होगा। मेरे विचार में यह उस जनदबाव का परिणाम है, जो पिछले कुछ वर्षों से शिक्षा व्यवस्था में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं, पेपर लीक, बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं की निराशा के कारण बनता गया।
नीट परीक्षा विवाद ने लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों के मन में यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाएँ भी सुरक्षित हैं। इसके बाद विभिन्न राज्यों में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने युवाओं का विश्वास और कमजोर किया। आज देश का छात्र केवल परीक्षा में सफलता नहीं चाहता, बल्कि वह एक ऐसी व्यवस्था चाहता है जिसमें उसकी मेहनत का सम्मान हो और भ्रष्टाचार के लिए कोई स्थान न हो।
यही कारण है कि आज का आंदोलन केवल एक व्यक्ति या एक मंत्री के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के विरुद्ध दिखाई देता है जिसे बड़ी संख्या में युवा शिक्षा के व्यवसायीकरण, पेपर लीक माफिया और जवाबदेही की कमी के लिए जिम्मेदार मानते हैं। यदि सरकार केवल चेहरे बदलकर समस्या का समाधान तलाशेगी, तो संभव है कि युवाओं का असंतोष समाप्त न हो।
भारत का जेन-जी वर्ग अब पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक, डिजिटल और राजनीतिक रूप से सक्रिय है। सोशल मीडिया ने उसे केवल अपनी बात कहने का मंच ही नहीं दिया, बल्कि देशभर के छात्रों को एक-दूसरे से जोड़ने का माध्यम भी बनाया है। आज किसी एक राज्य में हुई परीक्षा संबंधी गड़बड़ी कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय मुद्दा बन जाती है।
भारत विश्व का सबसे युवा देशों में से एक है। ऐसे में रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था केवल चुनावी वादे नहीं रह सकते, बल्कि शासन की प्राथमिक जिम्मेदारी हैं। यदि इन क्षेत्रों में लगातार असंतोष बना रहेगा तो उसका राजनीतिक प्रभाव भी स्वाभाविक रूप से दिखाई देगा।
मेरा मानना है कि किसानों के लंबे आंदोलन के बाद अब युवाओं ने भी यह संदेश दिया है कि लोकतंत्र में जनमत को लंबे समय तक अनदेखा नहीं किया जा सकता। किसी भी सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह विरोध को केवल राजनीतिक चुनौती न माने, बल्कि उसे जनता की वास्तविक चिंताओं को समझने के अवसर के रूप में देखे।
आज आवश्यकता केवल दोष तय करने की नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की है। पेपर लीक के मामलों में त्वरित जांच, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई, भर्ती परीक्षाओं में पूर्ण पारदर्शिता, निजी शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही और छात्रों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना समय की मांग है।
इतिहास बताता है कि परिवर्तन हमेशा युवाओं की ऊर्जा से आता है। यदि सरकारें समय रहते युवाओं की आकांक्षाओं को समझ लें तो परिवर्तन विकास का माध्यम बनता है, अन्यथा वही असंतोष बड़े जनआंदोलनों का रूप ले सकता है।
धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा यदि वास्तव में शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधारों की शुरुआत बनता है, तो यह देश के लिए सकारात्मक संकेत होगा। लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक क्षति को सीमित करने का प्रयास साबित होता है, तो आने वाले समय में युवाओं का आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
अंततः लोकतंत्र का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सरकारें जनता से बड़ी नहीं होतीं। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन जनता की अपेक्षाएँ और अधिकार स्थायी होते हैं। भारत का युवा अब केवल वादे नहीं, बल्कि परिणाम चाहता है। यही आने वाले वर्षों की भारतीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण दिशा तय करेगा।
(लेखक : मप्र कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता हैं)
