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“भारत में परीक्षाएं और नागरिक कर्तव्य”

aaptak.co.in1@gmail.com June 23, 2026
neet ug

डॉ. कपिल भार्गव

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तब कक्षा पांचवीं बोर्ड परीक्षा होती थी और मेरे गांव में पांचवी की बोर्ड परीक्षा नहीं होती थी गांव से दूर 3-4 किलोमीटर दूसरे गांव में परीक्षा होती थी! वैसे चाचा जी की मुझे ले जाने की जिम्मेदारी होती थी और वह उस समय मुझे साइकिल से परीक्षा स्थल तक ले जाते थे और परीक्षा होने तक चाचाजी परीक्षा स्थल वाले गांव में ही रुक कर मेरा इंतजार करते थे, अंत में जब मैं बाहर आता था चाचा जी नियत स्थान पर मिलते थे उनके साथ में अपने गांव आ जाता था। 1 दिन की बात है चाचा जी कहीं खेत पर थे, मेरी परीक्षा थी, परीक्षा से पहले तक चाचा जी घर नहीं आए और जब आए तब तक थोड़ा विलंब हो चुका था तीन-चार किलोमीटर का रास्ता साइकिल से पहुंचना था तो चाचा जी ने तेजी से साइकिल चलाई और कॉपियां तथा पेपर बंटते बंटते हम परीक्षा स्थल पर पहुंचे चुके थे।

जैसे-तैसे परीक्षा स्थल पर प्रवेश मिल गया और मैंने परीक्षा दी। परीक्षा में विलंब होने का कष्ट मैं पांचवी कक्षा में ही प्राप्त कर लिया था और अभिभावकों को भी कितनी पीड़ा होती है उसे भी महसूस कर लिया था। वह परीक्षा केवल पांचवी कक्षा की थी और मेरा यदि एक पेपर छूट भी रहा था तो मैं बाद में देकर भी पास हो जाता लेकिन परीक्षा छूटने का जो कष्ट होता है उसे तो मैं महसूस कर चुका था इसीलिए परीक्षा में सम्मिलित न हो पाने की सन्निधि का कष्ट मुझे भली भांति ज्ञात है। इससे कहीं ना कहीं कक्षा पांचवी में ही परीक्षा स्थल पर समय से पहुंचने का एक संदेश अवचेतन मन में प्राप्त हो गया सो जिंदगी में जब भी परीक्षाएं दीं समय से पहले पहुंचने का एक निर्णय किया और समय पर पहुंचा।

कक्षा आठवीं तक जिस गांव में पढ़े उस गांव में कक्षा 9वी और 10वीं का विद्यालय नहीं था तो उसके लिए गांव से दूर 10 किलोमीटर साइकिल से जाना होता था, रास्ते में एक छोटी नदी थी जिसका नाम था “सूखा” था, जब अत्यधिक वृष्टि होती थी तब सूखा अपना विकराल रूप धारण कर लेती थी, और जब भी हम उसके किनारे आते थे मुझे तो दादाजी की सुनाई हुई रामचरितमानस की यह चौपाई हर दम याद आती थी

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥3॥

और वह छुद्र नदी वृष्टि काल में इतना विकराल रूप धारण कर लेती थी कि हमारी कक्षाएं नदी के उस पर ही रहती थीं अकेले उसे पार करना संभव ही ना हो पता था। कुछ बच्चे हम अपने गांव के और कुछ एक और दूसरे गांव के उस नदी को पार करके पढ़ने जाते थे, जिस दिन अधिक बारिश होती थी चाचा जी नदी तक आते थे और पहले हमारे बस्ते नदी के उस पार तैरकर रख कर आते थे फिर एक-एक को पकड़कर नदी पार कर कर लौटकर घर आ जाते थे। शाम तक वह नदी पूर्णतः उतर जाती थी और यदि वृष्टि और अधिक हुई है तो चाचा जी पुनः उस स्थान पर आ जाते थे, और वही प्रक्रिया। तो अध्ययन का वह कठिनतम समय भी मैंने न केवल देखा है अपितु महसूस किया है।

आज का समय संसाधनों का है संप्रेषण के उत्कृष्टतम साधनों का है, न केवल भारत इन साधनों से सिकुड़ गया है अपितु संपूर्ण भूमंडल संसाधनों से बहुत छोटा लगने लगा है। सरकारें भी छात्रों के लिए दिल खोलकर सहयोग में लगी रहती हैं, चाहे उनकी साइकिल वितरण हो मेधावी छात्रों के लिए स्कॉलरशिप हो, प्राइवेट/सरकारी कॉलेज में कैटिगरी के अनुसार फीस माफी हो या परीक्षाओं का उत्कृष्टतम आयोजन हो सभी में सरकार जी जान से कार्य करतीं हैं। आज मैं केंद्र सरकार की जिस संस्था में कार्य करता हूँ उसमें लगभग प्रत्येक छात्र पर वर्ष भर में औसतन डेढ़ से दो लाख रुपए भारत सरकार खर्च करती है। और पूरे भारत में संस्था में अध्ययन करने वाले लाखों लाख छात्र हैं तो निश्चित रूप से सरकार एक बहुत बड़ी राशि छात्रों के अध्ययन हेतु प्रत्येक वर्ष व्यय करती है। और संस्था में प्रवेश लेने हेतु भी विशेष प्रावधान भिन्न-भिन्न वर्गों के छात्रों के लिए उपलब्ध हैं। इससे निश्चित ही यह सिद्ध होता है कि भारत सरकार भारत के भविष्य के लिए प्रयत्नशील है एवं जीडीपी का लगभग 6% सच्चे मन से खर्च कर रही है।

तब भारत के जनमानस विशेष कर अभिभावकों का यह दायित्व बनता है कि अपने पाल्य को अभूतपूर्व रूप से प्राप्त हो रहीं सरकारी सुविधाओं में पढ़ने में सहायक सिद्ध हों। चूंकि मैं दक्षिण भारत में भी पदस्थ रहा हूं तो देखने में यह आया है की उत्तर भारत की तुलना में कहीं ना कहीं दक्षिण भारत में स्थित इन शैक्षणिक संस्थाओं के अभिभावक अधिक जागरूक एवं छात्रों के अधिगम, अध्ययन एवं अध्यापन के लिए औसतन अधिक प्रयत्नशील हैं। यही कारण है कि जब संपूर्ण भारत का रिजल्ट आता है तो कहीं ना कहीं दक्षिण भारत के जो क्षेत्रीय कार्यालय हैं उनसे रिजल्ट उत्कृष्ट आने की सूचना लगभग प्रत्येक वर्ष प्राप्त होती है। अतः छात्रों के भविष्य के निर्माण हेतु अभिभावकों का सक्रिय होना अत्यंत आवश्यक है।

हाल ही में नीट की परीक्षा पुनः हुई एक अभिभावक और छात्रा को परीक्षा में लेट होने के कारण बिलखते देखा पूरे भारत में इस दृश्य को देखा गया सच में हृदय पर गहरा प्रभाव डालती हैं। परंतु इस संचार के युग में एक परीक्षा का आयोजन होना और उसमें लगा हुआ मानव संसाधन शनिवार के दिन जो की छुट्टी का दिन था एक दिन पहले आता है पूरे दिन आने वाली परीक्षा की योजना में लगता है फिर रविवार के दिन प्रातः 8:00 बजे परीक्षा स्थल पर आ जाता है और परीक्षा की पूर्व तैयारियां करने में लग जाता है। 8 से 9 बजे, 9 से 10 बजे, 11 बजे से उसके बाद 11:30 से 1.40 बजे तक छात्रों को परीक्षा कक्ष में प्रवेश की अनुमति होती है। अर्थात लगभग 2 घंटा 10 मिनट का समय छात्रों को प्रवेश के लिए रखा जाता है और तब तक परीक्षा केंद्र के अंदर लगा हुआ मानव संसाधन एक-एक बच्चे का इंतजार करता है और उसकी परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए सकुशल उसकी सीट तक पहुंचाता है।

अटेंडेंस शीट की प्रविष्टियां, ओएमआर शीट की प्रविष्टियां, कक्षा में उपस्थित/अनुपस्थिति , छात्रों को वॉशरूम एवं पानी की व्यवस्था एवं परीक्षा हॉल में प्रवेश से लेकर परीक्षा हॉल को छोड़ने तक के सारे कार्यों को भली भांति से प्रत्येक व्यक्ति संपादित करता है। इन सारी प्रक्रियाओं में उसे ज्ञात नहीं की संस्था के प्रवेश द्वार पर क्या चल रहा है? उसके लिए परीक्षा प्रभारी, प्रशासनिक टीम, #NTA के अधिकारी एवं स्थिति कोऑर्डिनेटर तक अपना पूर्ण अवधान रखते हैं और प्रवेश द्वार पर यथाशीघ्र प्रत्येक छात्र को अंदर आने के लिए प्रेरित करते हैं। जितनी बार भी इस प्रकार की परीक्षाएं होती हैं प्रत्येक मानव संसाधन अपना 100% परीक्षा को सफल बनाने के लिए देता है। 3 घंटे 15 मिनट की परीक्षा के लिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पूरे दो दिन तन-मन से समर्पित करता है। किसी भी प्रकार की प्रशंसा के बगैर।

किसके पास है इस मानव संसाधन के लिए संवेदनाएं, कहां है नीट परीक्षा का पैसा प्रत्येक छात्र के लिए वापस कर देने वाली सरकार के लिए संवेदनाएं? कहां है कुछ ही समय में पुनः कितना सारा खर्च कर परीक्षा करवाने वाली प्रणाली के प्रति संवेदनाएं? अगर दूसरा पहलू देखा जाए तो जिन छात्रों ने पहले परीक्षा दी और फिर पुनः परीक्षा देने बैठ रहे हैं तो क्या उन्हें पहले दी गई परीक्षा से परीक्षा का एक अनुभव प्राप्त नहीं हुआ? क्या उन्हें पुनः परीक्षा होने से तैयारी के लिए कुछ और समय नहीं मिला? इन सब पर संवेदनाएं प्रकट करने वाला समाज कहां है?

मैं मानता हूं कि एक भी छात्र का किसी भी कारण परीक्षा में न बैठ पाना कितना पीड़ा दायक होता है, परंतु इतना समय रहते हुए भी अंतिम क्षणों के उपरान्त परीक्षा स्थल के समक्ष आने वाला अभिभावक और वह छात्र थोड़ा भी उत्तरदाई नहीं है? निश्चित ही चिंतनीय विषय है!!और यदि केवल सरकार ही कटघरे में हैं तो भारत में चल रहे कोचिंग के एक भयानक मकड़ जाल पर अभिभावक इतना विश्वास क्यों जाता रहे हैं, जो प्रत्येक परीक्षा को कहीं न कहीं बाधित करते हैं। क्या यह कोचिंग का मकड़जाल छात्रों को डमी स्कूल करवाने के लिए प्रेरित नहीं कर रहा है। जिस उम्र में छात्र को विद्यालय में रहकर अपना अध्ययन करना चाहिए और प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ-साथ जीवन कौशलों को समझना चाहिए, वही एक मशीन के रूप में कोचिंग संस्थानों में बैठा हुआ अपने भविष्य के लिए रट्टू तोता नहीं बन जा रहा है। अभिभावकों को निश्चित रूप से इस ज्वलंत मुद्दे पर विचार करना चाहिए। अभिभावकों को मिलकर सोचना चाहिए कि हमें भारत में बुरी तरह से फैल रहे इस कोचिंग के विकराल मकड़जाल में न तो स्वयं फंसना चाहिए न ही अपने बच्चों को फसाना चाहिए।

क्या अभिभावकों को और छात्रों को परीक्षा के प्रति इतना सजग नहीं हो जाना चाहिए की 2 घंटे पहले से प्रवेश प्राप्त होने वाली परीक्षा में प्रवेश का समय समाप्त होने के 15 से 20 मिनट बाद में न आकर 11:30 से 1:40 के बीच परीक्षा कक्ष में पहुंचने की जिम्मेदारी स्वयं लें। अगर हम वास्तव में समाधान की ओर बात कर रहे हैं तो सरकार को भी परीक्षा को इतना सख्त कर देना चाहिए कि कोई भी उस प्रणाली के अंदर अनाधिकृत प्रवेश न कर पाए तथा छात्रों एवं अभिभावकों को भी सरकार की मनसा एवं समय सारणी का ख्याल अवश्य रखना चाहिए। भारत मिलकर ही समाधान निकाल सकता है; आरोप-प्रत्यारोपों में समाधान कहीं भी नहीं है!!

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