- आर.बी. सिंह

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर ईरान का वास्तविक (De-facto) नियंत्रण आज के समय में इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक मोड़ साबित हो रहा है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों (US Intelligence) और पेंटागन के वरिष्ठ सैन्य विश्लेषकों की हालिया रिपोर्टों ने वैश्विक सुरक्षा गलियारों में खलबली मचा दी है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का पूर्ण वर्चस्व किसी भी “परमाणु बम से ज्यादा शक्तिशाली हथियार” का रूप ले चुका है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!परमाणु बम का उपयोग केवल तबाही लाता है और उसके बाद वैश्विक प्रतिबंध या जवाबी परमाणु हमले का डर होता है। लेकिन होर्मुज जलमार्ग पर नियंत्रण एक ऐसा ‘अदृश्य ब्रह्मास्त्र’ है, जिसके जरिए ईरान बिना कोई परमाणु परीक्षण किए या बिना कोई बड़ा युद्ध शुरू किए, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बंधक बना सकता है। यही कारण है कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका को भी इस क्षेत्र में कूटनीतिक और सैन्य रूप से ‘चित’ होना पड़ा है।
इस पूरे संकट को समझने के लिए सबसे पहले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की भौगोलिक स्थिति और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसकी भूमिका को समझना जरूरी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया का लगभग 20 से 22 प्रतिशत कच्चा तेल (Petroleum) इसी बेहद संकरे मार्ग से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत और कतर जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के जहाजों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में जाने के लिए इसी रास्ते का उपयोग करना पड़ता है।
इस मार्ग की कुल चौड़ाई कुछ जगहों पर मात्र 39 किलोमीटर है। लेकिन जहाजों के आने-जाने के लिए सुरक्षित समुद्री लेन (Shipping Lanes) केवल 3 किलोमीटर चौड़ी है। इसका मतलब यह है कि ईरान अपनी मुख्य भूमि से ही इस पूरी लेन पर सीधे नजर रख सकता है और इसे बहुत ही आसानी से ठप कर सकता है।
यदि ईरान इस मार्ग को कुछ दिनों के लिए भी पूरी तरह बंद कर देता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति में भारी गिरावट आएगी। ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे अमेरिका, यूरोप और एशिया के बाजारों में हाहाकार मच जाएगा। महंगाई अनियंत्रित हो जाएगी और वैश्विक मंदी आ जाएगी। ईरान की यही क्षमता उसे परमाणु बम से अधिक घातक बनाती है। यह मौजूदा युद्ध से साबित भी हो चुका है।
अमेरिका को हमेशा अपनी तकनीकी श्रेष्ठता और नौसैनिक ताकत (Naval Supremacy) पर घमंड रहा है। अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा (US Fifth Fleet) बहरीन में तैनात है, जिसका मुख्य काम इस क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा करना है। हालांकि, ईरान ने हाल के वर्षों में पारंपरिक युद्ध (Conventional Warfare) के बजाय ‘एसिमेट्रिक वारफेयर’ (Asymmetric Warfare – असमान युद्ध रणनीति) को अपनाया है। उसने कुछ ऐसे स्वदेशी और कम लागत वाले हथियार विकसित किए हैं, जिन्होंने अमेरिका के अरबों डॉलर के हथियारों को बेकार साबित कर दिया है। इनमें ‘अर्श-ए-कमानगीर’ (Arash-e-Kamangir) एयर डिफेंस सिस्टम। यह ईरान का सबसे नया और गुप्त वायु रक्षा तंत्र है, जिसने अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है।
पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे अमेरिका का पैट्रियट या रूस का S-400) दुश्मन के विमानों को ढूंढने के लिए रडार तरंगों का उपयोग करते हैं। जब रडार चालू होता है, तो दुश्मन के सैटेलाइट या एंटी-रेडिएशन मिसाइलें उसकी लोकेशन का पता लगा लेती हैं। लेकिन ‘अर्श-ए-कमानगीर’ पूरी तरह से रडार-मुक्त (Radar-less) तकनीक पर काम करता है।
वहीं हीट-सीकिंग तकनीक पूरी तरह से ‘पैसिव इन्फ्रारेड’ और ‘हीट-सीकिंग’ तकनीक पर आधारित है। यह केवल दुश्मन के विमान या ड्रोन के इंजन से निकलने वाली गर्मी को पकड़कर मिसाइल दागता है। रडार सिग्नल न होने के कारण अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट और सर्विलांस सिस्टम को यह पता ही नहीं चल पाता कि यह सिस्टम कहां छिपा है। ईरान ने गुप्त सिस्टम का उपयोग करके अमेरिका के सबसे आधुनिक, महंगे और अजेय माने जाने वाले MQ-9 रीपर ड्रोन (MQ-9 Reaper Drone) को मार गिराया। इस घटना ने साबित कर दिया कि अमेरिकी स्टील्थ और ड्रोन तकनीक अब ईरान के सामने सुरक्षित नहीं है।
समुद्र में अमेरिकी नौसेना का सबसे बड़ा गौरव उसके विशालकाय विमान वाहक पोत (Aircraft Carriers) हैं। ईरान ने इन तैरते हुए किलों को नष्ट करने के लिए ‘होर्मुज-2’ मिसाइल तैयार की है। यह एक स्वदेशी एंटी-रेडिएशन मिसाइल है, जिसकी मारक क्षमता लगभग 300 किलोमीटर है। यह मिसाइल समुद्र में चल रहे अमेरिकी युद्धपोतों के रडार और संचार सिग्नलों को ट्रैक करती है और सीधे उन पर जाकर विस्फोट करती है। इसकी गति और सटीकता इतनी घातक है कि फारस की खाड़ी के संकरे पानी में तैनात किसी भी अमेरिकी युद्धपोत के लिए इससे बचना बेहद कठिन है।
ईरान की नौसेना (IRGC Navy) अमेरिकी नौसेना की तरह विशाल युद्धपोत नहीं बनाती। इसके बजाय, वे ‘मस्किटो फ्लीट’ (Mosquito Fleet) रणनीति का उपयोग करते हैं। ईरान सामान्य दिखने वाली छोटी स्पीड बोट्स और मछुआरों की नावों का उपयोग करता है। इन नावों के जरिए वे रात के अंधेरे में चुपचाप समुद्र में अत्यधिक आधुनिक, चुंबकीय और अदृश्य नौसैनिक माइन्स बिछा देते हैं। कुछ सौ डॉलर की ये माइन्स अमेरिका के अरबों डॉलर के गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर को डुबोने या भारी नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं। इसके अलावा, ईरान के पास ‘कामिकेज ड्रोन बोट्स’ (आत्मघाती नावें) हैं, जो बारूद से लदी होती हैं और सीधे अमेरिकी जहाजों से टकरा जाती हैं।
ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बनाए गए इस प्रचंड सैन्य और आर्थिक दबाव का ही नतीजा था कि संयुक्त राज्य अमेरिका को अपनी आक्रामक नीति छोड़नी पड़ी और बातचीत की मेज पर आना पड़ा। जून 2026 में फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान एक अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाक्रम हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राजनयिकों के बीच एक ऐतिहासिक 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस शांति समझौते को वैश्विक राजनीति में अमेरिका के पीछे हटने और ईरान की कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।
समझौते के मुख्य बिंदु और शर्तें में ईरान इस बात पर सहमत हुआ है कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से वाणिज्यिक और तेल टैंकर जहाजों की आवाजाही को बाधित नहीं करेगा और इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सुरक्षित रखेगा। दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने के लिए युद्धविराम (Ceasefire) को अगले 60 दिनों के लिए बढ़ा दिया गया है, ताकि स्थायी शांति का खाका तैयार किया जा सके। इस समझौते के बदले में अमेरिका ईरान को बहुत बड़ी आर्थिक राहत देने पर मजबूर हुआ है।
पश्चिमी बैंकों में फ्रीज (जब्त) किए गए ईरान के अरबों डॉलर के फंड को चरणबद्ध तरीके से जारी किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, यह राशि $25 अरब से लेकर $300 अरब तक हो सकती है, जो प्रतिबंधों से जूझ रही ईरानी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से दोबारा जीवित कर देगी। ईरान इस बात पर राजी हुआ है कि वह उच्च स्तर पर यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) नहीं करेगा और परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान ने इस समझौते में बहुत ही चालाकी से बाजी मारी है। ईरान को अब परमाणु बम बनाने की कोई जल्दबाजी या जरूरत ही नहीं है। परमाणु बम बनाने पर जो प्रतिबंध और वैश्विक दबाव ईरान झेल रहा था, उसने उस दबाव को ‘स्ट्रैट ऑफ होर्मुज’ के अपने नियंत्रण से बदल दिया। होर्मुज पर उसकी पकड़ ही उसका असली ‘परमाणु बम’ है, जिसके दम पर उसने अमेरिका से अरबों डॉलर का अपना जब्त पैसा भी वापस ले लिया और अपनी संप्रभुता को भी सुरक्षित कर लिया।
ईरान ने दुनिया को दिखा दिया है कि आधुनिक भू-राजनीति में केवल सैन्य बजट बड़ा होने से या सबसे महंगे हथियार होने से जीत सुनिश्चित नहीं होती। सही समय पर रणनीतिक भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाना, कम लागत वाली स्वदेशी तकनीक (जैसे ‘अर्श-ए-कमानगीर’) का विकास करना और दुश्मन की कमजोर नस (वैश्विक तेल व्यापार) पर हाथ रखना ही असली ताकत है।
इस शांति समझौते के बाद भले ही फारस की खाड़ी में तात्कालिक युद्ध का खतरा टल गया हो, लेकिन वैश्विक शक्ति संतुलन (Global Power Balance) हमेशा के लिए बदल गया है। अमेरिका को यह स्वीकार करना पड़ा है कि मध्य पूर्व (Middle East) में अब वह अपनी मर्जी से शर्तें तय नहीं कर सकता, और ईरान इस क्षेत्र की एक ऐसी महाशक्ति बनकर उभरा है जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है।
(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
